मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवर्ग-संघर्ष ३०७ विशेषता लानेका यत्न भी करता है। वह अपनी कमाई अपनी पत्नी एवं पुत्र-पौत्रोंको छोड़ जाता है या अपने बूढ़े माँ-बापकी सेवामें लगा सकता है। अपना और अपने पूर्वजोंके नाम अमर करनेके लिये अनेक प्रकारका सामाजिक उपकारका काम करता है। यज्ञ, तप, दानके द्वारा अपना लोक-परलोक बनानेके लिये अपनी कमाईका उपयोग कर सकता है। इस दृष्टिमे उत्साहका और ही रूप रहता है। जो शुद्ध जडवादी, धार्मिक, आध्यात्मिक संस्कारोंसे शून्य होते हैं, वे ही चार्वाकप्राय मार्क्सवादियोंकी योजनाओंमें सन्तुष्ट रह सकते हैं। वे ही कह सकते हैं— यावज्जीव सुखं जीवेद्ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत। भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ॥ (सर्वदर्शनसंग्रह १) अर्थात् जबतक जीवन रहे सुखपूर्वक रहे, किसीको मार, धमका, कानून बनाकर उसका वित्त, कलत्र, गृहभूमि छीनकर सुरापान करना चाहिये । शरीर मरकर भस्म हो जायगा। लोक-परलोक—कुछ भी सत्य नहीं, फिर धर्माधर्मके चक्करमें क्यों पड़ा जाय ? कुरान, पुराण, वेद, वाइविल, गिर्जा, गुरुद्वारा, मन्दिर, मसजिद, राम, रहीम, गाड, अहुरमज्ड, दोजख, वहिश्त, स्वर्ग, नरक कुछ भी नहीं। फिर किसी भी नियन्त्रण, सदाचार, दान, पुण्यकी क्या आवश्यकता रह जाती है ? घण्टेकी आवाजपर सामाजिक या सामूहिक कल- कारखानों या सरकारी खेतोंमें काम करना, भोजनालयोंमें भोजन कर लेना, सरकारी औरतोंसे सरकारी बच्चे पैदा करना, सरकारी शिशु पोषणालयोंमें उन्हें भेज देना, सरकारी अस्पतालोंमे बीमार होकर मर जाना, ऐसे यान्त्रिक जीवनमें न तो कोई उल्लास है, न उत्साह । न तो इसमें लौकिक ही सुख है, न परलोककी ही आशा । ऐसा नीरस, निरुत्साह जीवन उन्हें कथमपि पसन्द न होगा, जो कुछ भी दीन या ईमान मानते हैं, जिन्हें कुरान-पुराणादि उपर्युक्त वस्तुओंपर तनिक भी विश्वास है, ऐसा निराशापूर्ण जीवन वे कथमपि नहीं पसन्द कर सकते । ऐसे दीनदार, ईमानदार लोगोंके लिये धर्मसापेक्ष, पक्षपातहीन राज्य, रामराज्य ही श्रेष्ठ है, जहाँ लोक-परलोक सभी आशापूर्ण एव उत्साहप्रद होते हैं। इसी प्रकार आवश्यकताका भी निर्णय भोक्ता ही करे या सरकार ? यह स्पष्ट है कि सरकारद्वारा भोक्ताके आन्तरिक आवश्यकताका ध्यान रखे बिना किया हुआ निर्णय संतोषकारक नहीं होगा । भोक्ताओंकी दृष्टिसे ही यदि आवश्यकताका निर्णय होगा, तो यह नहीं कहा जा सकता कि उसकी शक्ति और आवश्यकताका संतुलन रहेगा। शक्ति एव योग्यता कम होनेपर भी, काम न करनेपर भी आवश्यकता अधिक हो सकती है। फिर राज्य उसकी पूर्ति कैसे कर सकेगा ? 'काम करनेमे आलसी भोजनको होशियार ।' 'अलसः स्यात्