भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 623

३०८ मार्क्सवाद और रामराज्य कामाश्च ।' आलसी किंतु अच्छे भोजन-वस्त्र, वाहन, मकानकी कामनावाले लोगोकी कमी किसी देशमें नहीं है । पर यह सम्भव नहीं । अतः— कर्म प्रधान विश्व करि राखा । जो जस करै सो तस फल चाखा ॥ यह भारतीय सिद्धान्त ही श्रेष्ठ है। जो जैसा करता है, वैसा ही फल पाता है । विश्वस्रष्टा परमेश्वर एवं विश्वहितैषी निष्काम महर्षियो या उनके भी सम्मान्य अनादि अपौरुषेय शास्त्रोंद्वारा ही कर्मफलका साध्य-साधनभाव जानना ठीक है । पारलौकिक कर्मों एव फलोंका साध्य-साधनभाव जिस प्रकार शास्त्रों एव शिष्टोद्वारा जाना जाता है, वैसे ही शास्त्रो एवं शिष्टोके आधारपर ही लौकिक कर्मों एवं उनके फलोंका भी साध्य साधनभाव निर्णीत होना श्रेष्ठ है । कम-से-कम निर्धारित, संतुलित जीवनस्तर एवं तदनुसार ही काम-दामके अतिरिक्त कर्मोंकी विशेषताके अनुसार ही फलोंमें विशेषताकी बात उपयुक्त होती है । इस पक्षमें आवश्यकताके अनुसार फलाकाङ्क्षा होगी । फलाकाङ्क्षाके अनुसार कर्ममें प्रवृत्ति होगी । परंतु शक्ति एवं योग्यता वहाँ नियामिका होगी । अतः शक्ति एवं योग्यतानुसार ही प्राणी कर्म कर सकेगा । तदनुसार ही फल पा सकेगा । अतः तदनुसार ही आवश्यकता भी बनानेका प्रयत्न करेगा । आवश्यकताका घटाना-बढ़ाना जितना सम्भव हो सकता है, शक्तिका घटाना-बढ़ाना उतना आसान नहीं है । फिर प्रतिदिन मजदूरी करना, सर्टिफिकेट दिखाकर भोजन लेना, यह कोई सम्मानकी बात नही । जब बँटवारेमें असमानता स्वीकार है, तो फिर समानताकी बात केवल प्रलोभन नहीं तो और क्या है ? फिर वहाँ भी ईमानदारीका प्रश्न खडा हो सकता है । अगर व्यवस्थापक ईमानदार हो तब तो ईमानदारीसे कर्मोनुसार वितरण कर सकेगा । यह भी तभी सम्भव है जब कि व्यक्तिके ईमानदारीपर विश्वास भी हो । पर यदि ऐसा विश्वास सम्भव ही है तब तो व्यक्तिगत काम लेनेवाला भी ईमानदारीसे फल वितरण कर सकता है। यदि व्यक्तयोंकी ईमानदारीका विश्वास नहीं हो सकता तो व्यवस्थापकोंकी ईमानदारीपर भी कैसे विश्वास होगा ? जो कहते हैं कि 'बेईमान व्यवस्थापक हटा दिया जायगा,' वह भी ठीक नहीं; क्योकि सभी शक्तियोके केन्द्रीकरण हो जानेसे, व्यक्तियोके पास व्यवस्थापकोंको हटानेकी कोई शक्ति नहीं रहती । सभी कम्युनिष्ट कभी समानरूपसे बौद्धिक, शारीरिक क्षमतायुक्त हो सकें तो उनका अन्तर मिट सकेगा । सभी समानरूपसे ईमानदार हो जायें, शक्तिभर काम करें और अनिवार्य आवश्यकतासे कोई अधिक दाम या सामान न ले, यह