मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुख-स्वप्न जड़वादियोंकी अपेक्षा अध्यात्मवादियोंके यहाँ कहीं अधिक सफल होता है। रामराज्यमें तो इस तरहके स्वप्न साकार भी हो चुके हैं— नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना ॥ नाधिव्याधिजराग्लानिदुःखशोकमयभ्रमाः । मृत्युश्चानिच्छतां चासीद् रामे राजन्यधोक्षजे ॥ (श्रीमद्भा० ९।१०।५४) न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपः। नानाहिताग्निर्नायज्वा न स्वैरी स्वैरिणी कुतः ॥ (छान्दोग्योप० ५।११।५) फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। चरहिं एक सँग गज पंचानन ॥ सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती ॥ जहाँ कोई किसीका शोषक न हो, दूसरेके पोषक तथा हितैषी ही हों, सभी सुखी, सम्पन्न, स्वधर्मनिष्ठ, ईश्वरपरायण, शिक्षित उदार हों, जहाँ कोई चोर, सुरापी, कायर, स्वैरी, स्वैरिणी न हो, सभी आहिताग्नि, यज्वा, स्वधर्मनिष्ठ हों, ऐसा शासनतन्त्र तो अध्यात्मवादमें ही सम्भव होता है। जड़वादमें तो इस सुखके पूरा होनेका स्वप्न दुराशामात्र ही है। शासनके कारोबारको चलानेके लिये तथा शिक्षा एवं अन्य कार्योंके लिये कोई भी सभ्य शासन कुछ अंश ही काटता है। अंग्रेज भारतपर शासन करते थे, वे भी आमदनी तथा खर्चका लेखा-जोखा बराबर दिखाते रहते थे। पर आजकल शासन, राष्ट्ररक्षणके नामपर, कितने गुप्तचर, पुलिस, पलटन एवं शस्त्रास्त्र अपेक्षित होते हैं, यह विज्ञोंसे तिरोहित नहीं है। प्राचीन भारतीय ढंगके धर्मनियन्त्रित शासनोंमें तो नियम यह था कि जैसे सूर्य तिग्मरश्मियोंसे पृथ्वीका जल खींचते हैं और समय आते ही उसे बरसाकर विश्व-कल्याण एवं रक्षण करते हैं, वैसे ही शासक भी प्रजाका कर उसके कुसमयमें वितरण कर देता था, उसे अपने उपभोगमें वह नहीं लाता था। कितने मुसल्मान बादशाह भी अपना निर्वाह टोपी सीकर, कुरान लिखकर, किताबें लिखकर, उन्हें बेंचकर कर लेते थे। ऐसे ही दूसरे राजा भी अपनी जीवन-यात्रा चलाते रहे हैं। यदि लाखोंका सालाना वेतन पानेवाले भी शोषित हैं और उनका राज्य भी कल्याणकारी राज्य है, तो फिर जमींदारोंका ही राज्य क्या बुरा है ? व्यावहारिक अनुभव तो यह है कि सूर्य भी उतना तापक नहीं होता जितना तत्सङ्घृष्ट वालुका- निकर (कण) तापक होता है। कहा जाता है मजदूरोंको भूखे मरते हुए लाचारीसे अल्प मूल्यमे बहुत काम करना पड़ता है, परंतु उसी तरह किसी अवसरपर मजदूर भी अवसरका अनुचित लाभ उठाते ही हैं। रिक्शे, ताँगे तथा नाववाले कभी-कभी चार आनेके बदले