भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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३१० मार्क्सवाद और रामराज्य आठ रुपये ले लेते हैं । किसी गरीबका लडका बीमार है, अस्पताल जाना है, यदि मौके-बेमौके अन्य रिक्शे आदि तैयार नहीं तो वह बिना रहम किये गरीबसे मनमाना पैसा लेता है । लाचार होकर गरीबको देना ही पडता है । ऐसे अवसरसे डाक्टर, इजीनियर—सभी नाजायज फायदा उठाते हैं । इसी तरह टूटते हुए बाँध, वर्षाके समय गिरते हुए मकान, अचानक बिगड़े हुए कारखानोंको सुधारनेके लिये श्रमजीवी मनमानी दाम लेते हैं । मार्गमें बिगड़ी हुई मोटरको सुधारनेमें अति शीघ्र सुधारनेकी आवश्यकता जानकर श्रमजीवी मनमाना दाम लेता है । कुम्भादिके अवसरपर मल्लाह दो पैसेके बदले गरीबों, धर्म-भीरुओंसे बीस-बीस ले लेते हैं । फिर कम्युनिष्ट इनको शोषित ही कहेगे और उनके इन कार्योंको उचित ही । इतना ही क्यों ? वे चोरी और हत्या-जैसी चीजको भी उनकी गरीबी और लाचारीकी दुहाई देकर उचित कहनेका प्रयत्न करते हैं, फिर तो किसीके बलात्कार व्यभिचारका भी यह कहकर समर्थन किया जा सकता है कि उसके पास स्त्री नहीं थी, कामातुर होकर उसने लाचारीसे बलात्कार किया है । वस्तुतः सर्व- मान्य परम्परा-सिद्ध किसी भी शास्त्रीय नियमको मानकर कम्युनिष्ट अपने किसी भी सिद्धान्तको सिद्ध नहीं कर सकता । इसीलिये वह प्राचीन नियमोंका समूल परिवर्तन चाहता है । पुराने सत्य, न्याय, सिद्धान्त, नियम—सबका ही परिवर्तन चाहता है। यद्यपि यह स्वाभाविक बात है कि जिस चीजकी बहुलता हो और माँग कम हो वह सस्ती हो जाती है, जिसकी माँग बहुत और मात्रा कम हो वह महँगी हो जाती है । यही स्थिति श्रम एवं मजदूरीके सम्बन्धमें भी लागू होती है, तथापि राज्यके द्वारा समय-समयपर जैसे योग्यता, आवश्यकता एवं उत्पादनके अनुसार काम, दाम, आरामका एक स्तर निर्धारण करना आवश्यक होता है, वैसे ही मजदूरीका भी एक स्तर निर्धारण करना पड़ता है । सस्ती, मन्दीके भावोंपर भी नियन्त्रण करना पड़ता है । अन्यथा आन्दोलनोंसे मजदूर वेतन बढ़ायेगा, पूँजीपति दाम बढायेगा । फिर किसानको कपड़े आदिके लिये ज्यादा पैसा चाहिये । अतः वह गेहूँ, चावल आदिका भी दाम बढायेगा । तब मजदूरका वह बढ़ा हुआ वेतन इसी आटा, दाल, चावल, कपड़ा खरीदनेमें खतम हो जायगा और फिर वेतन बढ़ानेका आन्दोलन करेगा । फिर महँगी बढ़ेगी, वितरण अतिरिक्त आयका पञ्चधा विभाजन करके भारतीय शास्त्रोंमें यद्यपि राष्ट्र- हितार्थ उसका विनियोग बतलाया है, फिर भी अतिरिक्त आयको अवैध या अनुचित नहीं कहा जा सकता । कोई भी उद्योग यदि लागत खर्च, सरकारी टैक्सभरके लिये ही आमदनी पैदा करता है तो उससे उद्योगपतिका जीवन भी चलाना कठिन होगा और बड़ी-बड़ी मशीनोंके खरीदने आदिका काम भी न