भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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षष्ठ परिच्छेद मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था मूल्यका आधार कहा जाता है, 'पूँजीवादी समाजके जीवन और गतिका आधार होता है खरीदना, बेचना तथा वस्तुओं एवं श्रमका विनिमय ही परस्पर सम्बन्धका सार है । मार्क्सके मतानुसार 'पूँजीवादके अन्तर्गत जो माल तैयार होकर बाजारमें जाता है उनके दो तरहके मूल्य होते हैं—एक उपयोग सम्बन्धी, दूसरा विनिमय-सम्बन्धी । पहलेका अभिप्राय उस वस्तुके गुणसे है, जिससे खरीदनेवालेकी शारीरिक या मानसिक आवश्यकताकी पूर्ति होती है। जिसका उपयोग मूल्य नहीं होता, उसका विनिमय या विक्रय नहीं होता। उपयोग मूल्यकी दृष्टिसे प्रत्येक वस्तु दूसरीसे भिन्न होना चाहिये। कोई आदमी एक मन गेहूँका परिवर्तन उसी ढंगके गेहूँसे नहीं करता; हाँ, उसका परिवर्तन २० गज कपड़ेमे कर सकता है। अब यह प्रश्न होता है कि एक वस्तुका विनिमय दूसरी वस्तुसे कैसे और किस नियमसे हो ? इसी नियम या कायदेका नाम विनिमय मूल्य है। इसका आधार श्रमके उस परिमाण और कठोरतापर निर्भर होता है, जो किसी वस्तुके बनाये या पैदा करनेमे आवश्यक होता है। बाजारमें श्रमके समान परिमाणका परस्पर बदला किया जाता है। श्रमका परिमाण इस दृष्टिसे नहीं नापा जाता कि अमुक व्यक्तिको एक वस्तु बनानेमें कितनी देर लगती है। किंतु समाजमें आमतौरसे प्रचलित प्रणालीसे जितना समय लगता है उसी हिसाबसे श्रमका परिमाण नापा जाता है। जैसे हाथसे कपडा बुननेवाले जुलाहेको २० गजके थान बनानेमें २० घंटे काम करना पड़ता है, जो कि आधुनिक मशीनोंद्वारा ५ घंटे या उससे भी कम समयमें बनाया जा सकता है। पर हाथसे कपड़ा बुननेवालेको—चौगुना-पाँचगुना मूल्य नहीं दिया जा सकता। अतः मार्क्सके मतानुसार वस्तुके विनिमय मूल्यका आधार वह परिमाण है, जो उस वस्तुके तैयार करनेमें लगता है। परंतु श्रमका यह परिमाण सदा एक सा नहीं रहता। नये आविष्कारोंसे माल तैयार करनेके ढंगमें उन्नति और श्रमजीवियोंकी उत्पादनवृद्धि आदि कारणोंसे किसी वस्तुके बनानेके लिये आवश्यक श्रमका परिमाण घट सकता है। उस अवस्थामें यदि दूसरी बातें (जैसे उसकी वस्तुकी माँग सिक्का आदि) ज्योंकी त्यों बनी रहें, तो विनिमय मूल्य भी कम हो जाता है। अतः श्रम ही विनिमय मूल्यका आधार है। विनिमय मूल्यका