भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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३१८ मार्क्सवाद और रामराज्य ही किसी समाज या देशकी सम्पत्तिका निर्णय किया जा सकता है। वस्तुओंके तैयार करनेमें जितना श्रम अपेक्षित होता है, अगर वे उससे कममें तैयार होने लगे, तो किसी देशकी सम्पत्ति आकारमें भले ही बड़ी हों, पर मूल्यकी दृष्टिसे नगण्य हो सकती हैं। उद्योग-धंधोंकी दृष्टिसे जो देश जितना अधिक अग्रसर होता है, उसकी सभ्यताका दर्जा जितना ऊँचा होता है, उतनी उसकी सम्पत्ति भी अधिक होती है। सम्पत्तिकी उत्पत्तिपर श्रम भी कम खर्च होता है। वर्तमान व्यावहारिक राजनीतिमें यह अधिक मजदूरी और कम घंटेके कामके रूपमें दृष्टिगोचर होती है। विनिमय मूल्यका आधार उपयोग-मूल्य ही होता है। यदि कोई चीज इतनी अधिक बन जाय, जिसकी लोगोंको आवश्यकता न हो, तो शेष वस्तुका कुछ भी मूल्य नहीं रह जाता, भले ही उसके तैयार करनेमें श्रम किया गया है। इसलिये विनिमय मूल्य या समाजद्वारा किये गये श्रमका पूरा फल तभी प्राप्त हो सकता है, जब कि वस्तुओकी पैदावार और उनकी माँगमें समानता बनी रहे। इसके लिये संघटन और समाजके मार्गदर्शनकी आवश्यकता होती है।' कहा जाता है, 'प्राचीन अर्थशास्त्रोंके मतानुसार पूँजीपति जो कि उत्पत्तिका नियन्त्रण करता है, अपनी पूँजीद्वारा मजदूरोंको औजार और कच्चा माल पहुँचाता है। वह तैयार मालको बिकवाता है, माल तैयार होनेके क्रमको जारी रखता है, अतः वही मूल्यका उत्पादक माना जाता है। वह श्रमजीवियोंकी भी उत्पत्तिका एक साधन गिना जाता है। पर मार्क्सके मतानुसार श्रमजीवी ही जो कच्चे मालसे वस्तुएँ तैयार करते तथा कच्चा माल उत्पन्न करके वस्तु-निर्माणके स्थानतक पहुँचाते हैं, मूल्यके एकमात्र उत्पादक हैं।' वस्तुतः यह कोई अनहोनी बात नहीं है। व्यवहारमें सुगमता लानेके लिये मुद्रा या रुपयोंका प्रचलन ठीक ही है। मनभर गेहूँका दाम दो बकरी या एक जोड़े जूतेका दाम एक मेज है, इस व्यवहारमें झंझट अधिक है। व्यवहारमें सुविधाके लिये रुपयाके द्वारा पदार्थोंके दाम आँके जाते हैं ! कोई सौदा देकर रुपया ले लेनेपर इस बातका संतोष रखता है कि आवश्यक होनेसे उस रुपयेसे कोई भी चीज खरीदी जा सकती है। पदार्थोंके संग्रह करने या ले जाने, ले आनेमें अनेक कठिनाइयाँ होती हैं। रुपयोंसे ऐसी कठिनाइयाँ दूर होती हैं। रहा यह कि पूँजीपतिको उसके द्वारा मुनाफा खींचने या जमा करनेका अवसर मिलता है। पर सदुपयोग-दुरुपयोग प्रत्येक वस्तुका किया जा सकता है। मशीन चलानेवाली, प्रकाश फैलानेवाली बिजलीसे प्राणी आत्महत्या भी कर सकता है। रुपयेसे व्यवहारमें हर प्रकारकी सुविधा ही होती है। उधार या कर्जके रूपमें लेना देना, उगाहना