मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदि रुपयेके व्यवहारमें सुगमता होती है । किसीको रुपयेसे लाभ होता है, एतावता वह बुरा नहीं कहा जा सकता । क्रय-विक्रयके काममें आनेवाली वस्तुओके दामका आधार भी केवल श्रम नहीं है, किंतु उपयोगिता एवं माँग दामका आधार है । और उसका भी परम आधार है उपकार्य-उपकारकभाव । विकासवादियोंके अनुसार अध्यात्मवादी नया आविष्कार नहीं मानते, किंतु वेदादिशास्त्रोंद्वारा विहित वर्णाश्रमानुसारी श्रौतस्मार्त्त धर्मद्वारा देवार्चन करना और उनके द्वारा प्रदत्त वृष्टि अन्न, प्रजा आदिरूपमें फल प्राप्त करना—यह सब भी विनिमय ही है । परम दार्शनिक भगवान् श्रीकृष्णने कहा है कि—तुम यज्ञसे देवताओंका अर्चनकर संवर्द्धन करो । देवता भी विविध फल प्रदानकर तुम्हारा संवर्द्धन करेंगे । इस तरह परस्पर एक दूसरेका पोषण करते हुए आप सब परम श्रेयके भागी होगे । देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ( गीता ३ । ११ ) निःसीम, ज्ञान, शक्ति-सम्पन्न ईश्वर ही है ।