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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 638

मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३२३

आवश्यक श्रम और पूँजीपतिके लिये किये गये श्रमको अतिरिक्त श्रम कहा जाता है। मार्क्स अतिरिक्त श्रमको बिना मूल्यका श्रम कहता है। इस तरह बदलेमें बिना कुछ दिये ही पूँजीपति मजदूरकी कमाई हजम करता रहता है।' मजदूरोंको उनके कामके अनुसार मजदूरी मिलनी परमावश्यक है। निष्पक्ष सरकार, जनता अथवा उभयपक्षीय विशेषज्ञ विद्वान् उचित मजदूरीकी दर निश्चित कर सकते हैं । समष्टि-हितकी दृष्टिसे सरकारको उस निश्चयकी मान्यता देनी चाहिये । उचित भोजन-वस्त्र, औषध, आवास-स्थान एव शिक्षाकी व्यवस्था सबके लिये होनी परमावश्यक है । उसके ऊपर भी योग्यता एव कामके अनुसार मजदूरको अधिकाधिक विकसित सुखी तथा साधनसम्पन्न होने, अपने श्रम न करने लायक माता पिता तथा बालक एवं अपनी अगली पीढीके लिये धन-सग्रह करनेका अधिकार होना चाहिये । यह सामान्य बात है कि दूसरोंकी वस्तु छीनना किसीको बुरा नहीं लगता, परंतु जब अपनी वस्तु छिनने लगती है, तब अवश्य पीड़ा प्रतीत होती है । मजदूरोके भी कुटुम्ब होते हैं। वे भी अपने कुटुम्बके भविष्यकी दृष्टिसे अनेक वस्तुओका संग्रह करते हैं । जब उनका संग्रह छिनने लगता है, तब उन्हे भी यह नहीं जँचता । कोई भी व्यापार, धंधा, उद्योग अपने फायदेके लिये ही किया जाता है। मजदूर भी फायदेके लिये नौकरी करता है। कोई आदमी अपनी खेती करके भी जीवन चला सकता है । फिर भी वह नौकरी करनेके लिये शहरोमें जाता है, वहाँ देहातोकी अपेक्षा कम परिश्रममे ही अधिक लाभ दिखायी देता है । तब फिर यह स्वाभाविक है कि पूँजीपति भी मजदूरी देकर मजदूरोसे लाभ उठाये । शास्त्रोके अनुसार भी ऋत्विक् आदिको जितनी दक्षिणा देकर यज्ञ किया जाता है, उससे लाखो गुणा अधिक फल यजमानको मिलता है । इसी तरह मजदूरोंको उचित वेतन दे देनेपर उनके द्वारा मालिकको अधिक लाभ होता हो तो उससे मजदूरका कुछ भी नुकसान नहीं होता । यदि उत्पादनमें श्रम ही सब कुछ होता, प्राकृतिक साधनो, मशीनोका महत्त्व न होता, मजदूर मजदूरी न लेता; तब अवश्य ही सब कुछ मजदूरका ही होना चाहिये था । परंतु जब अन्य साधन भी प्रधान- रूपसे अपेक्षित होते हैं, मजदूर मजदूरी लेता है, तो उत्पादनसे पूँजीपतिका लाभ अनुचित नहीं कहा जा सकता । अपने निर्वाहलायक ही काम करना तब उचित होता, जब दूसरेसे कोई प्रयोजन नहीं होता । अर्थात् जब वह अपनी पूँजीसे कच्चा माल लेकर उसे स्वय पक्का बनाकर बाजारमें ले जाता है और पूँजीसे अधिक मूल्य प्राप्त करता है, तब वह अधिक मूल्यको श्रम-फल मानता है। लेकिन जब कोई दूसरा पूँजी देता है तब उस लाभमें पूँजीवाला भी भागीदार बनेगा । इस अवस्था मे श्रमसे ही लाभ हुआ, यह नही कहा जा सकता । बिना लाभमें भाग पाये पूँजीवाला पूँजी देना स्वीकार भी न करेगा । दूसरा जब दाम देकर काम लेता है तो वह

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