मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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अवश्य चाहेगा कि इस कमाईसे मजदूरकी मजदूरी निकल आये और हमे भी कुछ मिल जाय । मजदूर सरकारको भी सरकारी काम चलानेके लिये लाभ चाहिये । यदि मजदूर अपने ही निर्वाह या लाभके लिये काम करे, संचालक सरकारके लिये कुछ न करे तो सरकारी खर्च कैसे चलेगा ? गुप्तचर, पुलिस, पलटन, शस्त्रास्त्र तथा वैज्ञानिको, अन्वेषको और विभिन्न आविष्कारोके लिये अरबोका लाभ आवश्यक है । लाभ बिना पूँजीपति दिवालिया हो जायगा । अकाल, दुष्काल, अति- वृष्टि, अनावृष्टि, महामारी, शलभ, मूषक, भूकम्प तथा अन्य उत्पातोके कारण नुकसान या घाटा होनेपर पूँजीपतिको कारखानो, मजदूरो एव अपना भी काम चलाना ही पड़ेगा । यदि लाभ न हो तो यह सब काम कैसे चलेगा ? पूँजी या लाभ बिना किसी भी राष्ट्र या सरकारका काम ही नहीं चल सकता । यह बात अलग है कि पूँजी एवं लाभ व्यक्तिके पास न जाकर मजदूर-सरकारके पास जाय जो पूँजी एवं लाभ एक जगह दोष था, वही दूसरी जगह जाकर गुण हो जाय, यह भी कम्युनिस्टोकी विचित्र बात है । अतएव मालिक सीधे-सीधे घंटो और महीनोके हिसाबसे श्रमको खरीदते हैं । कभी-कभी उससे लाभ न होनेपर भी उन्हे दाम देना पड़ता है । कभी कुछ लाभ मिलता है, कभी ज्यादा लाभ भी मिलता है । कोई सौदा भी खरीदनेसे यही बात होती है । कभी घाटा, कभी लाभ प्राप्त होता है। इसमें बिना कुछ दिये हजम कर जानेका प्रश्न ही नहीं उठता। अतः अतिरिक्त श्रम और अतिरिक्त मूल्यकी कल्पना इस दृष्टिसे सर्वथा व्यर्थ हो जाती है । अतिरिक्त लाभ मशीनोके आविष्कार होनेपर मशीनोंद्वारा लाखो मजदूरोका काम हो जाता है । फिर तो मशीनकी कमाईका फल मशीन-मालिकको मिलना ठीक ही है । कहा जाता है कि 'जमीन खोदनेवाले मजदूरको एक घंटेके परिश्रमका फल उतना नही मिलता, जितना कि एक इंजीनियरके परिश्रमका होता है।' इसका कारण मार्क्सवादियोकी दृष्टिसे यह है कि 'जमीन खोदनेका काम मनुष्य एक या दो दिनमें सीख सकता है, परंतु इंजीनियरका काम सीखनेके लिये १० वर्ष- का परिश्रम अपेक्षित होता है। १० वर्षकी मेहनतका दाम इंजीनियर अपने मेहनतके प्रत्येक घंटे और दिनमें वसूल करता है । इसीलिये उसके परिश्रमके एक घंटेका दाम मामूली मजदूरके एक घंटेके परिश्रमके दामसे दसगुना अधिक होता है।' उपर्युक्त तर्क अविचारितरमणीय है । वस्तुतः यहाँ श्रमवैचित्र्यसे ही उसके मूल्यका वैचित्र्य मानना उचित है। किस ढंगके परिश्रमका फल कितना और कैसा होता है, इसी आधारपर उसका दाम आँका जाना ठीक है । अन्यथा जबसे ही इंजीनियर काम सीखना आरम्भ करता है तबसे ही गरीब किसान जमीन