भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३२५ खोदने, हल जोतने, बोझा ढोनेका काम करता रहता है। इस तरह हर दृष्टिसे इंजीनियरके परिश्रमसे मजदूरोंका परिश्रम अधिक ही होता है। अध्यात्मवादीकी दृष्टिमें उसी तरह कालान्तर एव जन्मान्तरके कर्मों एवं उनके विचित्रतासे ही फलोंमें भेद होता है। समष्टि जगत्के परमहितकी दृष्टिसे विचारपूर्ण सूक्ष्म कर्मों के फलस्वरूप ही उच्चकोटिके ज्ञान-विज्ञानसम्पन्न जन्म होते हैं। जन्मान्तरीय सुकृत-दुष्कृत कर्मोंके अनुसार ही प्राणियोंको विविध प्रकारके वैध भूमिधन आदि दान, क्रय, दान, पुरस्कार आदिरूपमें प्राप्त होते हैं। जन्मान्तरीय सुकृत- दुष्कृत वैचित्र्य बिना मनुष्य-पशु आदिके जन्म-वैचित्र्यका हेतु जड़वादी कुछ भी नहीं कह सकते। हेतु विचित्रता बिना कार्यमें विचित्रता असम्भव ही होती है। अतः धर्माधर्म-वैचित्र्यमें ही फल वैचित्र्य मानना पड़ेगा। वस्तुतः मार्क्स आदि भौतिकवादी विश्वको निरीश्वर ही मानते हैं। उनकी दृष्टिमें न ईश्वर है, न जड़-देहादि संघातसे भिन्न आत्मा और न जन्मान्तर। अतएव जन्मान्तरीय कर्मों तथा जन्मान्तरीय कर्मफल भोग भी उन्हें मान्य नहीं है। जैसा कि हम पहले लिख चुके हैं, उनके सभी विचार विकासवादकी दृष्टिसे चलते हैं। उनके मतानुसार पक्षी, पशु, वानर, वनमानुष आदि क्रमसे मनुष्यका विकास हुआ है। संसार अल्पशक्तिसे बहुशक्तिमत्ताकी ओर, अज्ञतासे विज्ञताकी ओर, असभ्यतासे सभ्यताकी ओर तथा जंगलीपनसे नागरिकताकी ओर जा रहा है। फलतः सभीके पूर्वज पिता-पितामहादि अपने पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र आदिकी अपेक्षा अल्पज्ञ, अल्पशक्ति, असभ्य तथा जंगली थे। इस दृष्टिसे ऋषि, महर्षि अज्ञानी एवं जंगली ही थे। अतएव व्यास, वसिष्ठ, अत्रि, बृहस्पति, शुक्र आदि ऋषि-महर्षियोंकी शास्त्रीय व्यवस्थाओंको भी ये लोग अवैज्ञानिक, असंगत, संकीर्ण एव शोषणमूलक मानते हैं। बृहस्पति आदि ऋषियोंने व्यापारको मालिक एव मजदूरकी सम्मतिसे निश्चित लाभके लिये ही बताया है। वेतन मजदूरी आदिको परिमित ही माना है। लाभांश पूँजीपतिका ही माना है। भूमिका लगान भी इन ऋषियोंने मान रखा है, परंतु मार्क्सवादी इसे स्वीकार नहीं करते। वे आर्ष इतिहासको प्रमाण नहीं मानते—भले ही आधुनिक मिथ्या मनगढत इतिहासोंको ही सत्य मान लें। उनके अनुसार 'पहले सब मनुष्य जगली थे, असभ्य थे, परिवार आदि नहीं बसाते थे। हजारों वर्ष बाद परिवारकी प्रथा चली, फिर खेती करना सीखा। अनेक वस्तुओंका बनाना और उनका उपयोग करना सीखा। आवश्यकता- से अधिक अन्न तथा अन्य वस्तुएँ पैदा होने लगीं। तब दूसरे पड़ोसियोंसे विनिमय- की बात भी सीखी। भूमि पहले किसीकी नहीं थी, खेती करनेसे लाभ होते देखकर प्रवल लोगोंने दुर्बलोंसे भूमि छीनी। दुर्बलोंसे धन भी छीन लिया तथा