भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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३२६ मार्क्सवाद और रामराज्य उनसे जबर्दस्ती काम लेकर उनकी कमाईको हड़प कर राजा, जमींदार, धनवान् या पूँजीपति बन गये । दुर्बलोंको साधनहीन बनाकर युगोंसे उनका शोषण चल रहा है। उन्हींके परिश्रम एवं कमाईका सब वैभव है, जिससे पूँजीपति और जमींदार, सामन्त लोग मौज ले रहे हैं। इसीलिये आजके यान्त्रिक महान् औद्योगिक विकास युगका जो कुछ भी भूमि, पूँजी या मुनाफा है, सब मजदूरोंका ही है, सब उन्हीं- की कमाई है। लागत खर्चसे अधिक जो भी दाम सौदा बेचनेसे मिलता है, सब मजदूरोंकी मेहनतका ही फल है। वह सब मजदूरोंको न मिलकर उसका स्वल्पांश मिलता है, यह अन्याय है। अतः अब सब भूमि, पूँजी, कल-कारखाने, मशीन, पूँजीपतियोंके हाथसे छीनकर सम्पूर्ण राष्ट्रोंका मालिक मजदूरको ही बनाना चाहिये। मजदूरका अधिनायकत्व सम्पादित कर पूँजीपति सेठ आदिकोको इतना कुचल देना चाहिये, जिसमें कभी भी सिर उठाने लायक न रह जायें । इसके लिये न्याय-अन्याय, हिंसा-अहिंसा, अपहरण आदि जो भी करना पड़े वही धर्म है, वही न्याय है, वही शास्त्र है। किसी भी पुराने न्याय, धर्म, सत्य, अहिंसा, या शास्त्र और तदनुकूल नियम व्यवस्थाओंको एकदम नष्ट कर देना चाहिये।' इस तरह अध्यात्मवादी धर्मनियन्त्रित शासन ' रामराज्य धर्मसापेक्ष पक्षपातहीन राज्यका भौतिकवादी समाजवाद, साम्यवादके साथ किसी तरह भी कोई समन्वय हो सकना असम्भव है। पूर्व-पश्चिम या अन्धकार-प्रकाशके समान इनका परस्पर आधारमें, साधनमें, साध्यमें, व्यवहारमें महान् मतविरोध है। अध्यात्मवादीके मतानुसार जगत्प्रपञ्च चेतन सर्वज्ञ ईश्वरका कार्य है, देहभिन्न अनादि, अनन्त जीवोंके शुभाशुभ जन्मान्तरीय कर्मोंकी विचित्रतासे ही जगत्की विचित्रता होती है। जडवादी कहते हैं कि ईश्वर नहीं है, परंतु ईश्वरका अभाव भी उन्होंने कैसे जाना ? यदि कहे कि उपलब्ध नहीं होता—इसलिये ईश्वर नहीं है, तो यह असंगत है। क्योकि कितनी वस्तुएँ विद्यमान रहनेपर भी सूक्ष्म रहनेसे उपलब्ध नहीं होतीं। अति दूर होनेपर पर्वत आदि तथा आकाशमें उड़ते हुए पक्षी नहीं दीखते। अति सामीप्यके कारण नेत्रस्थ अञ्जन भी अपने ही नेत्रोंसे नहीं दीखता । इन्द्रियघात अन्धत्व, बधिरत्वसे भी रूप-शब्द आदि नहीं गृहीत होते । मनकी अनवस्थितिसे, कामादिसे उपहतमनस्क स्फीतालोक-मध्यवर्ती घटको भी नहीं देख सकता। अति सूक्ष्म होनेसे समाहितमनस्क प्राणी भी परमाणु आदिको नहीं देख सकता । व्यवधानसे वस्तु अन्तर तिरोहित वस्तुका दर्शन नहीं होता, जैसे कुड्यादि व्यवहित वस्तुका अदर्शन। तारों आदिका अदर्शन अभिभवके कारण ही नहीं होता, जैसे सूर्यकी प्रभासे अभिभूत होनेके कारण दिनमें रहते हुए भी तारागण नही दीखते । समानाभिहारसे भी वस्तुका उपालम्भ नहीं होता, जैसे जलाशयमें निपतित तोय-विन्दु‌का भेद अनुभूत नहीं होता। क्षीर