भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३२७ आदि अवस्थामें दधि, घृत आदि अनुद्भूत होनेसे भी अनुपलब्ध होते हैं, वैसे ही परमाणु, प्रकृति, परमेश्वरकी भी अनुपलब्धि होती है। अभावके कारण अनुपलब्धि नहीं कही जा सकती। 'अतिदूरात्सामीप्यादिन्द्रियघातान्मनोऽनवस्थानात्। सौक्ष्म्याद् व्यवधानादभिभवात् समानाभिहाराच्च ॥ सौक्ष्म्यात्तदनुपलब्धिः' (सांख्यकारि० ७, सां० द० १ । १०८, महाभाष्य ४ । १ । ३, चरकसूत्र ० १० । ८) कहा जा सकता है कि 'फिर तो उपलब्ध न होनेपर भी जैसे ईश्वर, आत्मा आदिकी सत्ता मान लेते हैं, उसी तरह अनुपलब्ध होनेपर भी सप्तम रस एव खपुष्पादि भी मान लेना पडेगा।' परन्तु इसका उत्तर यह है कि प्रकृति, आत्मा, परमात्मा आदि प्रमाणसिद्ध हैं, सप्तम रस खपुष्पादि प्रमाणसिद्ध नहीं हैं। प्रमाणसे ही प्रमेयकी सिद्धि होती है। जैसे रूपोपलब्धि रूप-क्रियाके द्वारा नेत्ररूप सूक्ष्म इन्द्रियकी सत्ता सिद्ध होती है, वृक्षके द्वारा बीजका अनुमान होता है, वैसे ही प्रपञ्चरूपी कार्यके द्वारा उसका उपादान कारण एव कर्त्तारूपी निमित्त कारणका अनुमान होता है। वही उपादान एव निमित्तकारण प्रकृतिविशिष्ट ईश्वर है। शय्या, प्रासाद आदिसंघात-विलक्षण चेतन देवदत्त आदिके लिये होते हैं। इसी तरह देहेन्द्रियादि सघात भी स्वविलक्षण किसी असंहत चेतनके लिये अवश्य होने चाहिये। इन युक्तियोंसे तर्क-अनुमानोंसे चेतनात्मा तथा परमेश्वरकी सिद्धि होती है। यदि प्रत्यक्षद्वारा अनुपलब्ध होनेसे ही वस्तुका अभाव निर्णय किया जाय, तब तो गृहसे विनिर्गत जनोको न देखकर उनका भी अभाव समझ लिया जायगा। अतःप्रत्यक्षयोग्यकी प्रत्यक्षानुपलब्धिसे ही अभावका निर्णय किया जा सकता है। घ्राणातिरिक्त श्रोत्रादि अन्य इन्द्रियोसे अग्राद्य होनेपर भी केवल घ्राणद्वारा उपलब्ध होनेसे गन्धकी सत्ता मान्य है। अतः गन्धका अभाव नहीं कहा जा सकता। चित्तकी एकाग्रतारूपी योगसे उद्भूत सामर्थ्ययुक्त ऋतम्भरा प्रज्ञाद्वारा तथा अपौरुषेय आगमद्वारा आत्मा, परमात्माका दृढ निर्णय होता है। विवेक-विज्ञान- द्वारा सर्वभासक अखण्ड बोध, अखण्ड सत्ताका, जो कि सभी परिच्छिन्न बोधो एवं सत्ताओंका उद्गमस्थान है, स्वप्रकाशरूपसे स्पष्ट साक्षात्कार होता है। चक्षुरादि स्थूल प्रत्यक्ष साधन एवं काँच, यन्त्र या यान्त्रिक विश्लेषणोसे वैज्ञानिकोंको उपलब्ध न होनेमात्रसे प्रकृति, परमेश्वरादिका अभाव नहीं कहा जा सकता। अनेक चीजोंको वैज्ञानिक पहले नहीं जानते थे, अव जानने लगे हैं। प्रथम जिन परमाणु हाइड्रोजन शक्तियोंका ज्ञान उन्हें नहीं था, उन्हींका आज प्रत्यक्ष हो रहा है। एतावता वे शक्तियाँ पहले नहीं थीं—यह कैसे कहा जा सकता है ? वायुयानका जब आविष्कार नहीं हुआ था, तब यह भी असम्भव-जैसी चीज थी; परन्तु अव सम्भव हो गयी। पहले सूर्यमण्डलसे भूमण्डलकी उत्पत्ति मानकर