भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 643, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 643

३२८ मार्क्सवाद और रामराज्य ही विकासवादी संतुष्ट हो गये थे, परंतु फिर बादमें पृथ्वी आदि भूत-चतुष्टयको सूर्यका भी कारण समझा । फिर कई लोगोंने आकाशको भी स्वीकार कर लिया । अब बहुतोंको प्रकृतिमें भी विश्वास होने लगा है । सम्भव है आगे चलकर आत्मा, परमात्मा आदिका भी कुछ आभास उपलब्ध हो । जो विज्ञान स्वयं अभी अपनेको प्रकृतिके अनन्त भण्डारमेंसे अतिक्षुद्र कणके भी सम्पूर्णतया जानकार होनेका दावा नहीं करता, उस विज्ञान एवं वैज्ञानिक यन्त्र-बलपर ईश्वर, धर्मशास्त्र तथा सर्वज्ञकल्प ऋषियों, महर्षियों तथा योग्य सामर्थ्यका खण्डन करना एक दुस्साहसपूर्ण मूर्खता है । अध्यात्मवादी प्रत्यक्ष, अनुमान तथा आर्ष एवं अपौरुषेय आगमोंके आधारपर परमेश्वरसे सृष्टि मानते हैं, शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार जगत्की विचित्रता मानते हैं । जैसे शास्त्रानुसार ही निकृष्ट कर्मोंके फलस्वरूप श्वान, शूकर, गर्दभ आदि योनियोंमें जन्म होता है, उन्हें मनुष्योचित शय्या, प्रासाद, भोजन आदि नहीं प्राप्त होता, वैसे ही पशु आदिकी अपेक्षा उत्कृष्ट, परंतु निकृष्ट कर्मोंके कारण ही कुछ ऐसे मनुष्योंका भी जन्म होता है, जिनके पास पर्याप्त भूमि, सम्पत्ति आदि नहीं होती । इसी तरह कर्मोंके उत्कर्षापकर्षके कारण ही भूमि, धन, उच्च मस्तिष्क विद्यादिसम्पन्न मनुष्य 'तथा देवादि जन्म होते हैं । इस दृष्टिसे कुछ लोग उत्पादन, साधन एव श्रम दोनोंहीसे सम्पन्न होते हैं । कुछ लोग श्रमसे ही जीविका उपार्जन करते है । उन्हींके सम्बन्धमे वेतन, मजदूरी आदिका विवेचन शास्त्रोंमें है । यद्यपि काम करनेवाले और काम करानेवालोंके ही आपसी समझौतेसे मजदूरी या वेतन आदिका दर निश्चित होता है, तथापि राष्ट्रकी आर्थिक स्थिति लाभ और कामकी स्थितिको देखकर समाज या सरकार भी औचित्यके आधारपर मजदूरीका दर निर्णय कर सकते हैं । शास्त्रोंमें साझेकी खेतीकी एव साझेके व्यापारोंकी भी पर्याप्त चर्चा है, परंतु लाभमें साझेदारोका हिस्सा मान्य होता है, नौकरोंका नहीं । क्योंकि उन्हे नौकरी मिलती ही है । मालिक इसी लाभके लिये रुपया, कच्चा माल, मशीन और बुद्धि-परिश्रमका उपयोग करता है । कभी-कभी घाटा भी उठाता है, जिसमें साझेदार ही हिस्सेदार होते हैं, मजदूर नहीं । कहा जाता है कि 'पूँजी, मशीन आदि साधन ' भी मजदूरोंके ही श्रमका फल है; क्योंकि छोटे व्यापार एव छोटी मात्रामें होनेवाली खेतीसे जो क्रमशः धन- राशि संगृहीत हुई है, वह भी मजदूरो एव मालिको ( हलवाहो ) के अतिरिक्त परिश्रमके फलस्वरूप अतिरिक्त आयका ही संग्रह है । परंतु यह भी तो हो सकता है कि कोई स्वयं खेती करनेवाला किसान अपने ही खेतसे अन्न या तेलहन आदि उत्पन्न करता है और स्वयं ही कोल्हूमें तेल पेरता है । अन्य तेल बेचकर पूँजी इकट्ठा