मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरता है, या वकालत, डाक्टरीके पेशेसे जिससे कि सैकड़ों, हजारोंकी प्रतिदिन आमदनी होती है, या इंजीनियरीके पेशेसे पर्याप्त धन कमाता है । वह अपने ही परिश्रमसे कमाया हुआ धन है, उस पूँजीसे व्यापार करनेवालेके व्यापारमें या औद्योगिक कार्यमें होनेवाला लाभ तो पूँजीपतिका मानना ही पड़ेगा । कहा जाता है कि 'मशीनोंके अधिकाधिक विकाससे मशीनोंकी सहायतासे पैदावार बढ़ जाती है, परंतु मेहनतकी शक्ति घट जाती है, अर्थात् बहुत मजदूरोंकी जरूरत नहीं पड़ती, अतः उसका दाम भी कम पड़ता है । इससे पूँजीपतिका लाभ खूब बढ़ जाता है।' परंतु यह अनुचित भी तो नहीं है, जब वैज्ञानिको और मशीनों- पर पर्याप्त पैसा लगाया गया है, तभी तो मशीनें बनी हैं। फिर उनका फायदा उठाना क्यों अनुचित है ? जैसे मार्क्सवादी इं जीनियरके डजीनियरी सीखनेके समयके श्रमके दामका भी कामके घंटोंके दाममें वसूल करना उचित मानते हैं, वैसे ही वैज्ञानिकोके शिक्षाका खर्च, अन्वेषणका व्यय, मशीन बनानेका व्यय, मशीन खरीदनेका खर्च आदिका भी तो दाम और उसका मुनाफा वमूल करना उचित है । पैसेका सूद रूसी मार्क्सवादी भी देते हैं, अतः पैसेका भी लाभ होना उचित है। जैसे कोई कच्चे मालसे पक्का माल पैदा करनेवाला उपयोगी सौदा बनाकर कच्चे मालके दामसे अधिक दाम वसूल करता है, वैसे ही पैसेके दामसे कहीं अधिक दाम पैसेको काममें लगाकर वसूल किया जाना उचित ही है । मार्क्सके मतसे मशीनोंके द्वारा पैदावार बढ़ जानेसे एवं मजदूरोंकी कम अपेक्षासे मजदूरोंकी बेकारी बढ़ती है । मजदूरोंकी बेकारीते पचानवे प्रतिशत मजदूरवाले समाजमें क्रय (खरीदने) की शक्ति घट जाती है । इसलिये बाजारमें माल- की खपत कम होती है । तदर्थ माल कम पैदा करनेकी चेष्टामें और मजदूर कम करने पड़ते हैं । इससे और बेकारी बढ़ती है । फलस्वरूप खपत और कम हो जाती है।' इस तरह पूँजीवादी प्रणालीमें उत्पन्न हुए गतिरोधको समाप्त करनेका मार्क्सीय उपाय यह है कि 'समाजकी आवश्यकताओंको पूर्ण करनेके लिये जितने आवश्यक सामाजिक श्रमकी जरूरत हो, उसे सम्पूर्ण समाज सहयोगसे करे, कोई भी व्यक्ति बेकार न रहे । पैदावारके उन्नतिके साधनोंकी सहायतासे प्रत्येक व्यक्तिको कम परिश्रम करना पड़े और साथ ही पैदावारको भी बढ़ाया जाय । अपने परिश्रमके अनुसार सब फल पाये । इससे प्रत्येक श्रमिकको परिश्रम कम करना पड़ेगा, परंतु खरीदनेकी शक्ति सबके पास बनी रहेगी, अतः मालके खपतमें कमी न होगी ।' अध्यात्मवादी रामराज्यमें यद्यपि लाभका अधिकारी उद्योगपति ही है तथापि लाभका पञ्चधा विभाजन करके एक हिस्सा मालिकके काम आता है । अवशिष्ट धर्म, यश आदिके नामपर राष्ट्रके काममें खर्च कर दिया जाता है । लाभ एव कामके अनुसार ही मजदूरोंकी मजदूरीका भी दर निश्चित किया जाता है ।