भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 645

३३२ मार्क्सवाद और रामराज्य या मुनाफा कहलाता है, वह शुद्धरूपसे मेहनतका ही फल है। इसी प्रकार जब पूँजीपति बडे पैमानेपर सौदा तैयार कराता है, तब भी लागत खर्चसे अधिक जो भी दाम मिलता है, वह लाभ या मुनाफा मजदूरोंकी मेहनतका ही फल है। सौदेके मूल्यमेंसे कच्चे मालका मूल्य निकाल लेनेपर केवल सौदेका खर्च और मेहनतका ही मूल्य बच जाता है, पर पूँजीपति मेहनतका पूरा फल मजदूरको दे देता है तो मुनाफेकी कोई गुंजाइश ही नहीं रहती। अतः मजदूरके मेहनतका जितना फल उसको मिलता है उतना ही पूँजीपतिको अधिक लाभ होता है।' पर यह विचार एकाङ्गी दृष्टिकोणसे ही है । लाभ या मुनाफा केवल मेहनतका फल नहीं हो सकता, किंतु वह कच्चे माल एवं मेहनत दोनोंका ही फल है। यदि मेहनत बिना कच्चा माल अल्प मूल्यका था, तो कच्चे माल बिना मेहनत भी व्यर्थ थी। फिर तो जैसे पूँजीपतिने दाम देकर कच्चा माल खरीदा वैसे ही दाम देकर श्रम भी खरीदा। दोनोंके खरीदनेमें खर्च हुए । दामसे अधिक दाम जो मुनाफेके रूपमें मिला, वह पूँजीपतिका ही होता है । जैसे श्रमवाला अपने श्रमका फल चाहता है, वैसे ही कच्चा मालवाला अपने कच्चे मालका फल चाहता है। जैसे कभी-कभी अवसरपर कच्चे मालमें तेजी-मंदी आती रहती है, वैसे ही श्रममें भी सस्तापन और महँगापन आता रहता है। दुर्लभता एवं माँगकी अधिकता होनेपर कच्चा माल महँगा हो जाता है, वैसे ही दुर्लभता एवं माँगके अनुसार ही श्रम भी महँगा हो जाता है । कभी बाजारमें सस्ते दाममें कच्चा माल भी मिलता है, कभी सस्ते दाममें श्रम मिलता है। कहा जा सकता है कि 'कच्चे मालका जो दाम मिल गया, वह उसका दाम है', परंतु इसी तरह यह भी तो कहा जा सकता है कि मजदूरोंको भी श्रमका वेतन उन्हें मिल गया । इसी तरह श्रम और कच्चा माल दोनों ही श्रमिकका होता तो दोनोंका ही फल उसे ही मिलता या कच्चा माल खरीदनेका दाम और श्रम दोनों ही श्रमिकके होते तो भी सब फल उसीको मिलता । किंतु जब श्रम श्रमिकका है, कच्चा माल और उसका दाम दूसरेका है, तब तो जैसे श्रमका फल श्रमिकको मिलना चाहिये, वैसे ही कच्चे मालका भी फल उसके मालिकको मिलना ही चाहिये। जैसे श्रमिक मिलनेवाली मजदूरीको कम कहता है वैसे ही कच्चे मालका विक्रेता भी अपने मालके मिलनेवाले दामको कम कहता है । इन दोनोंको जो अपने पैसेसे इकट्ठा करता है, दोनोंका प्रबन्ध करता है, यद्यपि लाभकी आशा ही करता है, तथापि कभी-कभी अनुमानके विपरीत उसे नुकसान भी होता है। जो इन सब खतरोंको अपने सिरपर झेलता है, उसे उसके पैसे, परिश्रम, साहस, हानि एवं खतरा उठानेका आखिर क्या फल होगा ? अतः कच्चे मालके दाम निकालकर बचे हुए सौदेका दाम श्रमका ही फल है, यह कहना गलत है ।