भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३३३ हाँ, कच्चे माल एव श्रमके उचित मूल्यका निर्धारण करना आवश्यक है । इसपर भारतीय शास्त्रोने पर्याप्त प्रकाश डाला है । इससे पूँजीपतिके आयपर भी नियन्त्रण हो जाता है । शास्त्रोने मजदूरी या वेतनके सम्बन्धमें मुख्यरूपसे यही नियम माना है कि मालिक और नौकरका जो आपसी सम्मतिसे तय हुआ हो, वही उसकी मजदूरी है । भृतककी मिताक्षरामें इस प्रकार व्याख्या की है— मूल्येन यः कर्म करोति स भृतकः । ( याज्ञ० स्मृति, मिता० व्यव० १८३ ) मजदूरी या नौकरीको भृति शब्दसे कहा गया है । भृतिकी परिभाषा यों है— यत्र यादृशी भृतिः परिभाषिता स्वामिभृत्याभ्यां तादृशी तत्र भृतिर्भृत्येन लभ्यते । ( याज्ञ० स्मृ० वीरमित्रोदय टीका १९३ ) वहीं 'मिताक्षरा' में नारद-स्मृतिका यह वचन उद्धृत किया है— भृत्याय वेतनं दद्यात् कर्मस्वामी यथाकृतम् । आदौ मध्येऽवसाने वा कर्मणो यद्विनिश्चितम् ॥ ( नारद स्मृ० ६ । २ ) भृत्य एव स्वामीद्वारा निश्चित मूल्य ही वेतन है । हाँ, जहाँ वेतन विना निश्चित किये ही मालिक श्रम कराता है, वहाँ वाणिज्य, पशु तथा सस्य ( फसल ) से होनेवाले लाभका दसवाँ भाग नौकरको राजाद्वारा दिलाया जाना चाहिये— भृतिमपरिच्छिद्य य कर्म कारयति तं प्रत्याह— ( मिता० ) दाप्यस्तु दशमं भागं वाणिज्यपशुसस्यतः । अनिश्चित्य भृतिं यस्तु कारयेत् स महीक्षिता ॥ ( याज्ञ० स्मृ० २ । १९४ ) खाली हल चलानेवाला उससे होनेवाली आमदनीसे तीसरा भाग पा सकता है । यदि उसे भोजन-वस्त्र भी मिलता हो, तो उसे लाभका पाँचवाँ भाग मिलना चाहिये— त्रिभागं पञ्चभागं वा गृह्णीयात् सीरवाहकः । भक्ताच्छादभृतः सीराद् भागं भुञ्जीत पञ्चमम् ॥ ( बृहस्पतिस्मृ० ) परतु जो नौकर देशकालानुसार विक्रय, कर्षण आदि कार्य ठीक ठीक नहीं करता और प्रकारान्तरसे लाभ उठाता है, वहाँ स्वामीकी इच्छा ही मुख्य है । अर्थात् उसे सम्पूर्ण वेतन नहीं देना चाहिये । अधिक लाभ करता है, तो दशमांश- से अधिक देना चाहिये— देशं कालं च योऽतीयाल्लाभं कुर्याच्च योऽन्यथा । तत्र स्यात स्वामिनश्छन्दोऽधिकं देयं कृतेऽधिके ॥ ( याज्ञ० स्मृ० २ । १९५ )