मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 647, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ें३३४ मार्क्सवाद और रामराज्य अनेक मजदूर जहाँ मिलकर काम करते हैं, वहाँ उनके कामके अनुसार वेतन मिलना चाहिये । कोई नौकर दो आदमीका काम करे तो उसे दुगुना तथा कोई यदि एक आदमीसे भी कम करे तो उसे कुछ कम वेतन भी मिलना चाहिये । यथा निश्चय अथवा मध्यस्थद्वारा निर्णीत वेतन मिलना उचित है, सभीको समान नहीं— यो यावत् कुरुते कर्म तावत्तस्य तु वेतनम् । उभयोरप्यसाध्यं चेत् साध्यं कुर्याद्यथाश्रुतम् ॥ ( याज्ञ० स्मृ० २ । १९६ ) गोपालन करनेवाले गोपालकी मजदूरीका रूप मनुने लिखा है कि 'जो भोजन-वस्त्र नहीं पाता, ऐसा गोपाल यदि दस गौओंका पालन करता हो, तो एक गायका दूध उसे मजदूरीके रूपमें मिलना चाहिये— गोपः क्षीरभृतो यस्तु स दुह्याद् दशतो वराम् । गोस्वाम्यनुमते भृत्यः सा स्यात् पालेऽभृते भृतिः ॥ ( मनु० ८ । २३१ ) राजकीय कर्मचारियोंके लिये दूसरे ढंगका भी वेतन है । दस ग्रामपर शासन करनेवालेके लिये एक कुलका लाभ मिलना चाहिये । बीस गाँवोंपर शासन करनेवालेको पाँच कुलका, शताध्यक्षको एक ग्राम एवं सहस्राध्यक्षको पुरका लाभ मिलना चाहिये । ग्रामवासी जो अन्न-पान, ईंधन आदि राजाको देते हैं, वह उस कर्मचारीको मिलना चाहिये । यह सब अधिकार, शिक्षा, योग्यता आदिके आधारपर समझना चाहिये— दशी कुलं तु भुञ्जीत विंशी पञ्चकुलानि च । ग्रामं ग्रामशताध्यक्षः सहस्राधिपतिः पुरम् ॥ ( मनु० ७ । ११९ ) कौटल्यने वेतन-निर्णयके प्रसगमे सूत्र कातनेके लिये कहा है कि 'सूतकी चिक्णता, स्थूलता, मध्यता आदि जानकर वेतन निर्धारण करे— श्लक्ष्णस्थूलमध्यतां च सूत्रस्य विदित्वा वेतनं कल्पयेत् । ( कौटलीय अर्थशास्त्र २ । २३ । ३ ) अच्छा काम देखकर वेतनसे अतिरिक्त तेल, उबटन आदि देकर मजदूरोंको सम्मानित करे—'सूत्रप्रमाणं ज्ञात्वा तैलामलकोद्वर्तनैरेता अनुगृह्णीयात्' ( कौट० अर्थ० २ । २३ । ५ ) काममें कमी हो, तो वेतनमे कमी होनी चाहिये—'सूत्रह्रासे वेतनह्रासः' ( वही ७ ) । वेतनका समय बीत जानेपर मध्यम वेतन देना चाहिये—'वेतनकालातिपाते मध्यमः' ( वही १६ ) । तीसरे अधिकरणके १४ वें अध्यायमें कौटल्यने मजदूरोके सम्बन्धमे बहुत कुछ कहा है । उससे भी प्रायः मालिक एवं नौकरद्वारा वेतन और कामका परिणाम निश्चित होता है । इसीलिये कहा गया है कि मालिकद्वारा निर्धारित कामसे अधिक करनेपर उतनी मिहनत व्यर्थ ही समझनी चाहिये—'सम्भाषितादधिकक्रियायां प्रयासं मोघं कुर्यात्' ( ३ । १४ । १३ ) इस प्रकरणमें याजकों तथा ऋत्विजोंके वेतनपर भी विचार किया गया है ।