भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मार्क्सकीय अर्थ-व्यवस्था ३३५ अतिरिक्त श्रम और मुनाफा मार्क्सवादियोंका कहना है कि 'मजदूरको मेहनतके फलका वह भाग जिसका दाम मजदूरको नहीं मिला मालिकका मुनाफा है।' मजदूर जितने समयतक मेहनत कर परिश्रमकी शक्तिका दाम पैदा करता है, उससे जितना भी वह अधिक करेगा, वह सब मालिकका मुनाफा होगा। यदि वह पाँच घंटे काम करके अपने परिश्रमकी शक्तिका दाम पूरा कर लेता है तो दिनभरके मेहनतके शेष घंटे मालिकके मुनाफेमें जाते हैं, वही अतिरिक्त श्रम है। अपनी श्रम-शक्तिको कायम रखनेके लिये मजदूरको जितना श्रम करना जरूरी है, उसमे जितना भी अधिक मजदूरको करना पड़ता है, वह आवश्यक या अतिरिक्त श्रम है। उसका दाम अतिरिक्त मूल्य है। यह अतिरिक्त श्रम एव अतिरिक्त मूल्य ही मालिकका मुनाफा है।' मार्क्सके आर्थिक सिद्धान्तोंकी यही आधारशिला है। उसके मतानुसार 'इस अतिरिक्त श्रम एवं अतिरिक्त दामको पानेका आन्दोलन ही मजदूर आन्दोलन है। इसके फलस्वरूप समष्टिवाद या समाजवाद स्थापित होगा। जिसमें प्रत्येक व्यक्ति शक्तिभर परिश्रम करे और अपनी आवश्यकताके अनुसार पदार्थोंको प्राप्त करे। इससे शोषणका अन्त होगा, किसीको अपनी इच्छा- विरुद्ध जीवन-निर्वाहके लिये विवश न होना पड़ेगा। फिर न उसके लिये नियन्त्रणकी जरूरत होगी, न शासन रहेगा और न सरकार रहेगी।' अतिरिक्त दामके सम्बन्धमें लेनिनका कहना है कि सौदेके विनिमयसे अतिरिक्त दाम (मुनाफा) प्राप्त नहीं हो सकता; क्योंकि उसे तो समान लागतके सौदोंको एक दूसरेसे बदला जाता है। सौदेका दाम न बढ़ने या घटनेसे भी अतिरिक्त दाम पैदा नहीं हो सकता। क्योंकि उसका तो इतना ही अर्थ होगा कि समाजके कुछ आदमियोंके हाथसे दाम निकलकर दूसरोंके हाथमें चला जायगा। समाजमें जो आज खरीदनेवाला है, वही कल बेचनेवाला और जो आज बेचनेवाला है, वही कल खरीदनेवाला बन जाता है। अतः अतिरिक्त दाम प्राप्त करनेके लिये पूँजीपतिको बाजारमें एक ऐसे सौदेकी खोज करनी पड़ती है, जिसे व्यवहारमें लाकर उसपर खर्च किये गये दामसे अधिक दाम प्राप्त किया जा सके। बाजारमें ऐसा सौदा मनुष्यकी श्रम-शक्ति ही है। मनुष्यकी श्रम-शक्तिका उपयोग है परिश्रम। परिश्रमका मूल है दाम। पूँजीपति मनुष्यकी मेहनतकी शक्तिको बाजारदामपर खरीद लेता है। दूसरे सब सौदोंकी तरह मनुष्यकी परिश्रम करनेकी शक्तिका दाम भी उसे पैदा करनेके लिये आवश्यक सामाजिक श्रमसे निश्चित करना पड़ता है। मनुष्यकी मेहनत-शक्तिको उस