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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

३२८ मार्क्सवाद और रामराज्य ही विकासवादी संतुष्ट हो गये थे, परंतु फिर बादमें पृथ्वी आदि भूत-चतुष्टयको सूर्यका भी कारण समझा । फिर कई लोगोंने आकाशको भी स्वीकार कर लिया । अब बहुतोंको प्रकृतिमें भी विश्वास होने लगा है । सम्भव है आगे चलकर आत्मा, परमात्मा आदिका भी कुछ आभास उपलब्ध हो । जो विज्ञान स्वयं अभी अपनेको प्रकृतिके अनन्त भण्डारमेंसे अतिक्षुद्र कणके भी सम्पूर्णतया जानकार होनेका दावा नहीं करता, उस विज्ञान एवं वैज्ञानिक यन्त्र-बलपर ईश्वर, धर्मशास्त्र तथा सर्वज्ञकल्प ऋषियों, महर्षियों तथा योग्य सामर्थ्यका खण्डन करना एक दुस्साहसपूर्ण मूर्खता है । अध्यात्मवादी प्रत्यक्ष, अनुमान तथा आर्ष एवं अपौरुषेय आगमोंके आधारपर परमेश्वरसे सृष्टि मानते हैं, शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार जगत्की विचित्रता मानते हैं । जैसे शास्त्रानुसार ही निकृष्ट कर्मोंके फलस्वरूप श्वान, शूकर, गर्दभ आदि योनियोंमें जन्म होता है, उन्हें मनुष्योचित शय्या, प्रासाद, भोजन आदि नहीं प्राप्त होता, वैसे ही पशु आदिकी अपेक्षा उत्कृष्ट, परंतु निकृष्ट कर्मोंके कारण ही कुछ ऐसे मनुष्योंका भी जन्म होता है, जिनके पास पर्याप्त भूमि, सम्पत्ति आदि नहीं होती । इसी तरह कर्मोंके उत्कर्षापकर्षके कारण ही भूमि, धन, उच्च मस्तिष्क विद्यादिसम्पन्न मनुष्य 'तथा देवादि जन्म होते हैं । इस दृष्टिसे कुछ लोग उत्पादन, साधन एव श्रम दोनोंहीसे सम्पन्न होते हैं । कुछ लोग श्रमसे ही जीविका उपार्जन करते है । उन्हींके सम्बन्धमे वेतन, मजदूरी आदिका विवेचन शास्त्रोंमें है । यद्यपि काम करनेवाले और काम करानेवालोंके ही आपसी समझौतेसे मजदूरी या वेतन आदिका दर निश्चित होता है, तथापि राष्ट्रकी आर्थिक स्थिति लाभ और कामकी स्थितिको देखकर समाज या सरकार भी औचित्यके आधारपर मजदूरीका दर निर्णय कर सकते हैं । शास्त्रोंमें साझेकी खेतीकी एव साझेके व्यापारोंकी भी पर्याप्त चर्चा है, परंतु लाभमें साझेदारोका हिस्सा मान्य होता है, नौकरोंका नहीं । क्योंकि उन्हे नौकरी मिलती ही है । मालिक इसी लाभके लिये रुपया, कच्चा माल, मशीन और बुद्धि-परिश्रमका उपयोग करता है । कभी-कभी घाटा भी उठाता है, जिसमें साझेदार ही हिस्सेदार होते हैं, मजदूर नहीं । कहा जाता है कि 'पूँजी, मशीन आदि साधन ' भी मजदूरोंके ही श्रमका फल है; क्योंकि छोटे व्यापार एव छोटी मात्रामें होनेवाली खेतीसे जो क्रमशः धन- राशि संगृहीत हुई है, वह भी मजदूरो एव मालिको ( हलवाहो ) के अतिरिक्त परिश्रमके फलस्वरूप अतिरिक्त आयका ही संग्रह है । परंतु यह भी तो हो सकता है कि कोई स्वयं खेती करनेवाला किसान अपने ही खेतसे अन्न या तेलहन आदि उत्पन्न करता है और स्वयं ही कोल्हूमें तेल पेरता है । अन्य तेल बेचकर पूँजी इकट्ठा

करता है, या वकालत, डाक्टरीके पेशेसे जिससे कि सैकड़ों, हजारोंकी प्रतिदिन आमदनी होती है, या इंजीनियरीके पेशेसे पर्याप्त धन कमाता है । वह अपने ही परिश्रमसे कमाया हुआ धन है, उस पूँजीसे व्यापार करनेवालेके व्यापारमें या औद्योगिक कार्यमें होनेवाला लाभ तो पूँजीपतिका मानना ही पड़ेगा । कहा जाता है कि 'मशीनोंके अधिकाधिक विकाससे मशीनोंकी सहायतासे पैदावार बढ़ जाती है, परंतु मेहनतकी शक्ति घट जाती है, अर्थात् बहुत मजदूरोंकी जरूरत नहीं पड़ती, अतः उसका दाम भी कम पड़ता है । इससे पूँजीपतिका लाभ खूब बढ़ जाता है।' परंतु यह अनुचित भी तो नहीं है, जब वैज्ञानिको और मशीनों- पर पर्याप्त पैसा लगाया गया है, तभी तो मशीनें बनी हैं। फिर उनका फायदा उठाना क्यों अनुचित है ? जैसे मार्क्सवादी इं जीनियरके डजीनियरी सीखनेके समयके श्रमके दामका भी कामके घंटोंके दाममें वसूल करना उचित मानते हैं, वैसे ही वैज्ञानिकोके शिक्षाका खर्च, अन्वेषणका व्यय, मशीन बनानेका व्यय, मशीन खरीदनेका खर्च आदिका भी तो दाम और उसका मुनाफा वमूल करना उचित है । पैसेका सूद रूसी मार्क्सवादी भी देते हैं, अतः पैसेका भी लाभ होना उचित है। जैसे कोई कच्चे मालसे पक्का माल पैदा करनेवाला उपयोगी सौदा बनाकर कच्चे मालके दामसे अधिक दाम वसूल करता है, वैसे ही पैसेके दामसे कहीं अधिक दाम पैसेको काममें लगाकर वसूल किया जाना उचित ही है । मार्क्सके मतसे मशीनोंके द्वारा पैदावार बढ़ जानेसे एवं मजदूरोंकी कम अपेक्षासे मजदूरोंकी बेकारी बढ़ती है । मजदूरोंकी बेकारीते पचानवे प्रतिशत मजदूरवाले समाजमें क्रय (खरीदने) की शक्ति घट जाती है । इसलिये बाजारमें माल- की खपत कम होती है । तदर्थ माल कम पैदा करनेकी चेष्टामें और मजदूर कम करने पड़ते हैं । इससे और बेकारी बढ़ती है । फलस्वरूप खपत और कम हो जाती है।' इस तरह पूँजीवादी प्रणालीमें उत्पन्न हुए गतिरोधको समाप्त करनेका मार्क्सीय उपाय यह है कि 'समाजकी आवश्यकताओंको पूर्ण करनेके लिये जितने आवश्यक सामाजिक श्रमकी जरूरत हो, उसे सम्पूर्ण समाज सहयोगसे करे, कोई भी व्यक्ति बेकार न रहे । पैदावारके उन्नतिके साधनोंकी सहायतासे प्रत्येक व्यक्तिको कम परिश्रम करना पड़े और साथ ही पैदावारको भी बढ़ाया जाय । अपने परिश्रमके अनुसार सब फल पाये । इससे प्रत्येक श्रमिकको परिश्रम कम करना पड़ेगा, परंतु खरीदनेकी शक्ति सबके पास बनी रहेगी, अतः मालके खपतमें कमी न होगी ।' अध्यात्मवादी रामराज्यमें यद्यपि लाभका अधिकारी उद्योगपति ही है तथापि लाभका पञ्चधा विभाजन करके एक हिस्सा मालिकके काम आता है । अवशिष्ट धर्म, यश आदिके नामपर राष्ट्रके काममें खर्च कर दिया जाता है । लाभ एव कामके अनुसार ही मजदूरोंकी मजदूरीका भी दर निश्चित किया जाता है ।

३३२ मार्क्सवाद और रामराज्य या मुनाफा कहलाता है, वह शुद्धरूपसे मेहनतका ही फल है। इसी प्रकार जब पूँजीपति बडे पैमानेपर सौदा तैयार कराता है, तब भी लागत खर्चसे अधिक जो भी दाम मिलता है, वह लाभ या मुनाफा मजदूरोंकी मेहनतका ही फल है। सौदेके मूल्यमेंसे कच्चे मालका मूल्य निकाल लेनेपर केवल सौदेका खर्च और मेहनतका ही मूल्य बच जाता है, पर पूँजीपति मेहनतका पूरा फल मजदूरको दे देता है तो मुनाफेकी कोई गुंजाइश ही नहीं रहती। अतः मजदूरके मेहनतका जितना फल उसको मिलता है उतना ही पूँजीपतिको अधिक लाभ होता है।' पर यह विचार एकाङ्गी दृष्टिकोणसे ही है । लाभ या मुनाफा केवल मेहनतका फल नहीं हो सकता, किंतु वह कच्चे माल एवं मेहनत दोनोंका ही फल है। यदि मेहनत बिना कच्चा माल अल्प मूल्यका था, तो कच्चे माल बिना मेहनत भी व्यर्थ थी। फिर तो जैसे पूँजीपतिने दाम देकर कच्चा माल खरीदा वैसे ही दाम देकर श्रम भी खरीदा। दोनोंके खरीदनेमें खर्च हुए । दामसे अधिक दाम जो मुनाफेके रूपमें मिला, वह पूँजीपतिका ही होता है । जैसे श्रमवाला अपने श्रमका फल चाहता है, वैसे ही कच्चा मालवाला अपने कच्चे मालका फल चाहता है। जैसे कभी-कभी अवसरपर कच्चे मालमें तेजी-मंदी आती रहती है, वैसे ही श्रममें भी सस्तापन और महँगापन आता रहता है। दुर्लभता एवं माँगकी अधिकता होनेपर कच्चा माल महँगा हो जाता है, वैसे ही दुर्लभता एवं माँगके अनुसार ही श्रम भी महँगा हो जाता है । कभी बाजारमें सस्ते दाममें कच्चा माल भी मिलता है, कभी सस्ते दाममें श्रम मिलता है। कहा जा सकता है कि 'कच्चे मालका जो दाम मिल गया, वह उसका दाम है', परंतु इसी तरह यह भी तो कहा जा सकता है कि मजदूरोंको भी श्रमका वेतन उन्हें मिल गया । इसी तरह श्रम और कच्चा माल दोनों ही श्रमिकका होता तो दोनोंका ही फल उसे ही मिलता या कच्चा माल खरीदनेका दाम और श्रम दोनों ही श्रमिकके होते तो भी सब फल उसीको मिलता । किंतु जब श्रम श्रमिकका है, कच्चा माल और उसका दाम दूसरेका है, तब तो जैसे श्रमका फल श्रमिकको मिलना चाहिये, वैसे ही कच्चे मालका भी फल उसके मालिकको मिलना ही चाहिये। जैसे श्रमिक मिलनेवाली मजदूरीको कम कहता है वैसे ही कच्चे मालका विक्रेता भी अपने मालके मिलनेवाले दामको कम कहता है । इन दोनोंको जो अपने पैसेसे इकट्ठा करता है, दोनोंका प्रबन्ध करता है, यद्यपि लाभकी आशा ही करता है, तथापि कभी-कभी अनुमानके विपरीत उसे नुकसान भी होता है। जो इन सब खतरोंको अपने सिरपर झेलता है, उसे उसके पैसे, परिश्रम, साहस, हानि एवं खतरा उठानेका आखिर क्या फल होगा ? अतः कच्चे मालके दाम निकालकर बचे हुए सौदेका दाम श्रमका ही फल है, यह कहना गलत है ।

मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३३३ हाँ, कच्चे माल एव श्रमके उचित मूल्यका निर्धारण करना आवश्यक है । इसपर भारतीय शास्त्रोने पर्याप्त प्रकाश डाला है । इससे पूँजीपतिके आयपर भी नियन्त्रण हो जाता है । शास्त्रोने मजदूरी या वेतनके सम्बन्धमें मुख्यरूपसे यही नियम माना है कि मालिक और नौकरका जो आपसी सम्मतिसे तय हुआ हो, वही उसकी मजदूरी है । भृतककी मिताक्षरामें इस प्रकार व्याख्या की है— मूल्येन यः कर्म करोति स भृतकः । ( याज्ञ० स्मृति, मिता० व्यव० १८३ ) मजदूरी या नौकरीको भृति शब्दसे कहा गया है । भृतिकी परिभाषा यों है— यत्र यादृशी भृतिः परिभाषिता स्वामिभृत्याभ्यां तादृशी तत्र भृतिर्भृत्येन लभ्यते । ( याज्ञ० स्मृ० वीरमित्रोदय टीका १९३ ) वहीं 'मिताक्षरा' में नारद-स्मृतिका यह वचन उद्धृत किया है— भृत्याय वेतनं दद्यात् कर्मस्वामी यथाकृतम् । आदौ मध्येऽवसाने वा कर्मणो यद्विनिश्चितम् ॥ ( नारद स्मृ० ६ । २ ) भृत्य एव स्वामीद्वारा निश्चित मूल्य ही वेतन है । हाँ, जहाँ वेतन विना निश्चित किये ही मालिक श्रम कराता है, वहाँ वाणिज्य, पशु तथा सस्य ( फसल ) से होनेवाले लाभका दसवाँ भाग नौकरको राजाद्वारा दिलाया जाना चाहिये— भृतिमपरिच्छिद्य य कर्म कारयति तं प्रत्याह— ( मिता० ) दाप्यस्तु दशमं भागं वाणिज्यपशुसस्यतः । अनिश्चित्य भृतिं यस्तु कारयेत् स महीक्षिता ॥ ( याज्ञ० स्मृ० २ । १९४ ) खाली हल चलानेवाला उससे होनेवाली आमदनीसे तीसरा भाग पा सकता है । यदि उसे भोजन-वस्त्र भी मिलता हो, तो उसे लाभका पाँचवाँ भाग मिलना चाहिये— त्रिभागं पञ्चभागं वा गृह्णीयात् सीरवाहकः । भक्ताच्छादभृतः सीराद् भागं भुञ्जीत पञ्चमम् ॥ ( बृहस्पतिस्मृ० ) परतु जो नौकर देशकालानुसार विक्रय, कर्षण आदि कार्य ठीक ठीक नहीं करता और प्रकारान्तरसे लाभ उठाता है, वहाँ स्वामीकी इच्छा ही मुख्य है । अर्थात् उसे सम्पूर्ण वेतन नहीं देना चाहिये । अधिक लाभ करता है, तो दशमांश- से अधिक देना चाहिये— देशं कालं च योऽतीयाल्लाभं कुर्याच्च योऽन्यथा । तत्र स्यात स्वामिनश्छन्दोऽधिकं देयं कृतेऽधिके ॥ ( याज्ञ० स्मृ० २ । १९५ )

३३४ मार्क्सवाद और रामराज्य अनेक मजदूर जहाँ मिलकर काम करते हैं, वहाँ उनके कामके अनुसार वेतन मिलना चाहिये । कोई नौकर दो आदमीका काम करे तो उसे दुगुना तथा कोई यदि एक आदमीसे भी कम करे तो उसे कुछ कम वेतन भी मिलना चाहिये । यथा निश्चय अथवा मध्यस्थद्वारा निर्णीत वेतन मिलना उचित है, सभीको समान नहीं— यो यावत् कुरुते कर्म तावत्तस्य तु वेतनम् । उभयोरप्यसाध्यं चेत् साध्यं कुर्याद्यथाश्रुतम् ॥ ( याज्ञ० स्मृ० २ । १९६ ) गोपालन करनेवाले गोपालकी मजदूरीका रूप मनुने लिखा है कि 'जो भोजन-वस्त्र नहीं पाता, ऐसा गोपाल यदि दस गौओंका पालन करता हो, तो एक गायका दूध उसे मजदूरीके रूपमें मिलना चाहिये— गोपः क्षीरभृतो यस्तु स दुह्याद् दशतो वराम् । गोस्वाम्यनुमते भृत्यः सा स्यात् पालेऽभृते भृतिः ॥ ( मनु० ८ । २३१ ) राजकीय कर्मचारियोंके लिये दूसरे ढंगका भी वेतन है । दस ग्रामपर शासन करनेवालेके लिये एक कुलका लाभ मिलना चाहिये । बीस गाँवोंपर शासन करनेवालेको पाँच कुलका, शताध्यक्षको एक ग्राम एवं सहस्राध्यक्षको पुरका लाभ मिलना चाहिये । ग्रामवासी जो अन्न-पान, ईंधन आदि राजाको देते हैं, वह उस कर्मचारीको मिलना चाहिये । यह सब अधिकार, शिक्षा, योग्यता आदिके आधारपर समझना चाहिये— दशी कुलं तु भुञ्जीत विंशी पञ्चकुलानि च । ग्रामं ग्रामशताध्यक्षः सहस्राधिपतिः पुरम् ॥ ( मनु० ७ । ११९ ) कौटल्यने वेतन-निर्णयके प्रसगमे सूत्र कातनेके लिये कहा है कि 'सूतकी चिक्णता, स्थूलता, मध्यता आदि जानकर वेतन निर्धारण करे— श्लक्ष्णस्थूलमध्यतां च सूत्रस्य विदित्वा वेतनं कल्पयेत् । ( कौटलीय अर्थशास्त्र २ । २३ । ३ ) अच्छा काम देखकर वेतनसे अतिरिक्त तेल, उबटन आदि देकर मजदूरोंको सम्मानित करे—'सूत्रप्रमाणं ज्ञात्वा तैलामलकोद्वर्तनैरेता अनुगृह्णीयात्' ( कौट० अर्थ० २ । २३ । ५ ) काममें कमी हो, तो वेतनमे कमी होनी चाहिये—'सूत्रह्रासे वेतनह्रासः' ( वही ७ ) । वेतनका समय बीत जानेपर मध्यम वेतन देना चाहिये—'वेतनकालातिपाते मध्यमः' ( वही १६ ) । तीसरे अधिकरणके १४ वें अध्यायमें कौटल्यने मजदूरोके सम्बन्धमे बहुत कुछ कहा है । उससे भी प्रायः मालिक एवं नौकरद्वारा वेतन और कामका परिणाम निश्चित होता है । इसीलिये कहा गया है कि मालिकद्वारा निर्धारित कामसे अधिक करनेपर उतनी मिहनत व्यर्थ ही समझनी चाहिये—'सम्भाषितादधिकक्रियायां प्रयासं मोघं कुर्यात्' ( ३ । १४ । १३ ) इस प्रकरणमें याजकों तथा ऋत्विजोंके वेतनपर भी विचार किया गया है ।

मार्क्सकीय अर्थ-व्यवस्था ३३५ अतिरिक्त श्रम और मुनाफा मार्क्सवादियोंका कहना है कि 'मजदूरको मेहनतके फलका वह भाग जिसका दाम मजदूरको नहीं मिला मालिकका मुनाफा है।' मजदूर जितने समयतक मेहनत कर परिश्रमकी शक्तिका दाम पैदा करता है, उससे जितना भी वह अधिक करेगा, वह सब मालिकका मुनाफा होगा। यदि वह पाँच घंटे काम करके अपने परिश्रमकी शक्तिका दाम पूरा कर लेता है तो दिनभरके मेहनतके शेष घंटे मालिकके मुनाफेमें जाते हैं, वही अतिरिक्त श्रम है। अपनी श्रम-शक्तिको कायम रखनेके लिये मजदूरको जितना श्रम करना जरूरी है, उसमे जितना भी अधिक मजदूरको करना पड़ता है, वह आवश्यक या अतिरिक्त श्रम है। उसका दाम अतिरिक्त मूल्य है। यह अतिरिक्त श्रम एव अतिरिक्त मूल्य ही मालिकका मुनाफा है।' मार्क्सके आर्थिक सिद्धान्तोंकी यही आधारशिला है। उसके मतानुसार 'इस अतिरिक्त श्रम एवं अतिरिक्त दामको पानेका आन्दोलन ही मजदूर आन्दोलन है। इसके फलस्वरूप समष्टिवाद या समाजवाद स्थापित होगा। जिसमें प्रत्येक व्यक्ति शक्तिभर परिश्रम करे और अपनी आवश्यकताके अनुसार पदार्थोंको प्राप्त करे। इससे शोषणका अन्त होगा, किसीको अपनी इच्छा- विरुद्ध जीवन-निर्वाहके लिये विवश न होना पड़ेगा। फिर न उसके लिये नियन्त्रणकी जरूरत होगी, न शासन रहेगा और न सरकार रहेगी।' अतिरिक्त दामके सम्बन्धमें लेनिनका कहना है कि सौदेके विनिमयसे अतिरिक्त दाम (मुनाफा) प्राप्त नहीं हो सकता; क्योंकि उसे तो समान लागतके सौदोंको एक दूसरेसे बदला जाता है। सौदेका दाम न बढ़ने या घटनेसे भी अतिरिक्त दाम पैदा नहीं हो सकता। क्योंकि उसका तो इतना ही अर्थ होगा कि समाजके कुछ आदमियोंके हाथसे दाम निकलकर दूसरोंके हाथमें चला जायगा। समाजमें जो आज खरीदनेवाला है, वही कल बेचनेवाला और जो आज बेचनेवाला है, वही कल खरीदनेवाला बन जाता है। अतः अतिरिक्त दाम प्राप्त करनेके लिये पूँजीपतिको बाजारमें एक ऐसे सौदेकी खोज करनी पड़ती है, जिसे व्यवहारमें लाकर उसपर खर्च किये गये दामसे अधिक दाम प्राप्त किया जा सके। बाजारमें ऐसा सौदा मनुष्यकी श्रम-शक्ति ही है। मनुष्यकी श्रम-शक्तिका उपयोग है परिश्रम। परिश्रमका मूल है दाम। पूँजीपति मनुष्यकी मेहनतकी शक्तिको बाजारदामपर खरीद लेता है। दूसरे सब सौदोंकी तरह मनुष्यकी परिश्रम करनेकी शक्तिका दाम भी उसे पैदा करनेके लिये आवश्यक सामाजिक श्रमसे निश्चित करना पड़ता है। मनुष्यकी मेहनत-शक्तिको उस

घंटेके लिये पूँजीपति उसे कामपर लगा देता है। मजदूर पाँच घंटे काम करके ही उतने दामका सौदा पैदा कर लेता है, जितना उसे दस घंटे काम करनेके बाद मिलता है । शेष पाँच घंटेमें मजदूर अतिरिक्त दाम या सौदा पैदा करता है, जो पूँजीपतिकी जेबमें जाता है। मार्क्सके मतानुसार अतिरिक्त श्रम या अतिरिक्त दाम ले सकना ही शोषणकी शक्ति और अधिकार है। समाजमें जहाँ कहीं शोषण होगा, इसी शक्ति एवं अधिकारके बलपर होगा। मनुष्यकी आदिम अवस्थामें पैदावारके साधन बहुत कमजोर थे; अतः दिनभर कठिन परिश्रमके बाद निर्वाहके लायक पदार्थ प्राप्त होते थे । उस समय मनुष्यद्वारा मनुष्यके शोषणकी गुंजाइश न थी । ज्यों-ज्यों पैदावारके साधनोंमें उन्नति होने लगी, मनुष्य पैदावार आसानीसे करने लगा और जितना उसके निर्वाहके लिये नितान्त आवश्यक था, उससे अधिक पैदा करने लगा; अर्थात् परिश्रमकी शक्तिको कायम रखनेके लिये जितना बिलकुल ही जरूरी था, उससे अधिक पैदा करने लगा तो यह पैदावार जमा होने लगी। यही धन हो गया और यही पैदावारका सबसे बड़ा साधन है।' इस कथनसे स्पष्ट है कि 'पैदावारके सबसे बड़ा साधन धनको उन्नत साधनके द्वारा व्यक्तिने स्वयं कमाया। ऐसा विकास होनेके बाद कुछ आदमियोंके परिश्रमका अतिरिक्त भाग दूसरोंके पास जमा होने लगा । वे अधिक साधन- सम्पन्न और बलवान् श्रेणीके बन गये।' परंतु पूर्वोक्त युक्तिसे तो सिद्ध हो गया कि वस्तुके मूल्यका आधार श्रम ही नहीं; कच्चा माल, मशीन आदि भी है, और कच्चे मालके समान ही श्रम भी खरीदा जाता है। श्रमका मूल्य माँग और पूर्तिके आधारपर अथवा पंचायत या न्यायालयद्वारा निर्धारित किया जाना उचित है, और ऐसा होता भी था । भारतीय धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र तथा आधुनिक भारतीय शासकोंके इतिहाससे भी यह सिद्ध है। ऐसी स्थितिमें अतिरिक्त श्रम, अतिरिक्त मूल्यका कोई अस्तित्व ही नहीं ठहरता । अतएव शोषणकी कहानी भी अतिरंजित ही है। हाँ, यह अवश्य है कि भारतीय दृष्टिकोणसे यदि ८ घंटे काम करनेके लिये ८ हृष्ट-पुष्ट बैल आवश्यक होते हैं तो अवश्य ही एक मजदूरसे बराबर दस घंटे काम लेना अनुचित है । साथ ही पूँजी और मुनाफ़ाको ध्यानमें रखते हुए मजदूरोंका वेतन कम-से-कम इतना तो अवश्य ही होना चाहिये, जिससे मजदूरोंको उचित शिक्षा एवं स्वास्थ्यकी उन्नति हो सके। अर्थात् भारतीय दृष्टिकोणसे यदि पशुके सम्बन्धमें उसके स्वास्थ्य और कामके घंटोंका इतना ध्यान रखा जाता है, तो मनुष्यके लिये जो सर्वोच्च कोटिका प्राणी है, शिक्षा-स्वास्थ्यका ध्यान रखते हुए कामके घंटोंकी कमी और पारिश्रमिककी अधिकताका ध्यान होना स्वाभाविक ही है !

[Header] मार्क्ससीय अर्थ-व्यवस्था ३३७

अतः कामके घंटे और मजदूरीका निष्पक्ष न्यायालयद्वारा तय होना उचित है। पैदावारके साधनोकी उन्नति यदि दोष नहीं है तो उसका होना उचित ही है। और जो पैदावारके साधनोंकी उन्नति कराता है, उसे उसका फल भी मिलना उचित ही है। फिर दूसरेकी उन्नतिसे दूसरेके पेटमें दर्द हो, इसे सिवा ईर्ष्याके और दूसरा क्या कहा जा सकता है ? कामके घंटोमें कमी होनेसे अधिकाधिक लोगोंको काम मिलेगा, वेकारी घटेगी, इससे जनतामें क्रय-शक्ति बनी रहेगी, मालकी खपत बढ़ेगी, जिससे उत्पादनमें बाधा न पड़ेगी। जिन वस्तुओंका उत्पादन उपभोक्ताओंकी आवश्यकतासे अधिक होने लगे, उनपर प्रतिबन्ध लगाकर अन्य उपयोगी वस्तुओंके उत्पादन एव तदुपयोगी उत्पादन-साधनोंके निर्माणका प्रयत्न होना चाहिये। इससे सभीका हित है। अतः इसके अनुकूल सरकारी प्रोत्साहन, प्रेरणा तथा आवश्यक आदेश भी होना चाहिये। इस तरह वेकारी भी रुकेगी, मालके खपतमे भी बाधा नहीं पड़ेगी और उपभोक्ताओंको आवश्यक उपभोग-सामग्री भी मिल सकेगी। यान्त्रिक विकासमें भी बाधा नहीं पड़ेगी और

३३८ मार्क्सवाद और रामराज्य बनानेका प्रयत्न किया जाता है। जिस गायसे दूध लिया जाता है, उसको इस लायक रखा जाता है कि वह कल भी सहायता देने योग्य रहे। यह नहीं कि एक दिन दूध लेकर उसे सदाके लिये मिटा दिया जाय। वस्तुस्थिति तो यह है कि आधुनिक मार्क्सवादियोने यह स्थिति उत्पन्न कर दी है कि छीनाझपटी करनेवाले लोगोकी बहुतायत हो गयी है। वे कहते हैं कि लेगे, मरकर लेगे, मारकर लेगे, जहन्नुममें जाकर, जहन्नुममे भेजकर लेगे, लूटकर-मारकर हर तरहसे लेगे, लेंगे, किन्तु फलस्वरूप देनेवाले कहते हैं कि मर जायेंगे, मिट जायेंगे, परंतु नहीं देगे, नही देगे। ठीक इसके विपरीत रामराज्यकी स्थिति यह है कि देनेवाला हर तरहसे देनेकी चेष्टा करता है। शास्त्र कहते हैं कि श्रद्धासे, प्रेमसे, लज्जासे, भयसे, हर तरहसे देना चाहिये। लेनेवालेको हर तरहसे बचना चाहिये। मुफ्तखोरीका माल हराम- खोरीका माल है। उससे वंशवृद्धि, समृद्धि तथा बरकत रुक जाती है। इस दृष्टिसे देनेवाला हर तरहसे देना चाहता है और लेनेवाला हर तरहसे बचना चाहता है। मार्क्सवादमें 'दो दो', 'नहीं नहीं' का उद्घोष होता है। रामराज्यमें 'लो लो' 'नहीं नहीं' का उद्घोष होता है। मार्क्सवादमे सब वस्तुएँ सरकारी हो जाती है, व्यक्तिकी कोई मिलकियत नहीं रहती है; किंतु रामराज्यमे व्यक्तियोकी बपौती सम्पत्ति सुरक्षित रहती है, और उसपर उचित धर्मनियन्त्रण रहता है। इस पक्षमें धन, धर्म या जान-मालकी रक्षा जो कि राज्य-स्थापनाका प्रमुख उद्देश्य है, सुरक्षित रहती है। मार्क्स को छोड़कर प्राच्य, प्रतीच्य सभी राजनीतिज्ञोने धर्म एव धनकी रक्षा या जान-मालकी रक्षा ही सभ्य व्यवस्थाका उद्देश्य माना है। इसीलिये व्यक्तियोने अपने अधिकार शासनको सौंपा था, जिसके पूरा न होनेपर राज्य-सत्ताको उलट देना जनताका जन्मसिद्ध अधिकार माना जाता है। मार्क्स- वादी व्यवस्थामें धर्म, धन एवं जान-मालका प्रत्यक्ष अपहरण होता है। वैध संपत्ति, बपौती आदिका कुछ भी महत्त्व मार्क्सके मतमें नहीं है। अतिरिक्त मूल्य और शोषण कहा जाता है कि 'कला-कौशल, उद्योग-धंधोके विकासके पहले जब दास- प्रथा थी, तब दासोका भी शोषण अतिरिक्त श्रमके रूपमें होता था। दास एवं गुलामको केवल अन्न और वस्त्र दिया जाता था। वह भी उतना ही जितना कि उसके शरीरमें परिश्रम करनेकी शक्ति कायम रखनेके लिये पर्याप्त था। दासद्वारा कराये गये परिश्रमके सम्पूर्ण फलको मालिक लोग भोगते थे। यही बात सामन्तशाही एव जागीरदारीके जमानेमें थी। सामन्तों एवं जागीरदारोंकी प्रजा कठिन परिश्रमसे जो पैदावार आदि उपज भूमि या भूमिकी पैदावारसे सम्बन्ध रखनेवाले दूसरे कामोसे करती थी, उसमेंसे इन लोगोके शरीरमें परिश्रम-शक्ति बनाये रखनेके लिये अत्यन्त आवश्यक भागको छोड़कर शेष भाग दाम, कर,

लगान या नजरानाके रूपमे मालिकके पास चला जाता था । परन्तु उस समय शोषण होता था मालिकोंके उपयोग और उपभोगके लिये । उस समय व्यवहारमें लाना ही उनका उपयोग होता था । इसलिये शोषण भी उतना ही होता था जितनेमे मालिकोकी आवश्यकता पूरी हो जाती थी । मालिक भी शोषणद्वारा प्राप्त धनको अपने व्यवहारमें खर्च कर देते थे, जिससे वह धन दूसरी श्रेणियोंके पास पहुँचकर फिर बाजारमें पहुँच जाता था और दूसरोंके उपयोगमे आता रहता था । परन्तु पूँजीवादके युगमें धनको पूँजी बनाकर उसका उपयोग खर्चके लिये नहीं, बल्कि अधिक धन पैदा करनेके लिये किया जाता है । उसके पैदावारके साधन बढाये जाते हे । पूँजीपतियोंके लिये मुनाफेका क्षेत्र बढाया जाता है। मुनाफेका बहुत छोटा भाग पूँजीपतियोंके खर्चमें आता है । शेष पूँजी बनकर मुनाफा कमानेके ही काममें आता है । जितना जितना अधिक मुनाफा होता है, उसमें और अधिक मुनाफा कमानेका यत्न किया जाता है । इस तरह पूँजीपतिके मुनाफा कमानेसे सन्तुष्ट होनेकी कोई सीमा नहीं रहती ।' वस्तुतः अङ्ग अङ्गीभाव तथा शेष-शेषी-भावसे ही सेव्य सेवक-भाव है । सेवक, दास आदि शब्द लगभग समानार्थ हैं । ससारमें ये भाव किसी-न-किसी रूपमें सदा ही बने रहते हैं । भले ही कहा जाय कि आज राजा-प्रजाका भाव मिट गया, आज प्रजा ही राजा है, सरकार या सरकारी आदमी सेवक हैं । फिर भी सिवा शब्दोंके व्यवहारके कोई भी अन्तर नही आया । आज केवल वोट डालनेके समयतक भले ही कुछ अशोंतक जनताका सम्मान किया जाय, परन्तु व्यवहारतः जिन लोगोंके हाथमें शासनयन्त्र आता है, भले ही अपना नाम वे सेवक रखे; किंतु वे सत्ताधारी राजेका भी कान काटते हैं । वस्तुत आज सेवको (शूद्रो) का ही राज्य है । मालिक कही जानेवाली जनता जो चाहती है, उसीकी पूर्ण उपेक्षा की जाती है । आज भारतीय जनता गोहत्या-बन्दी चाहती है, धर्महत्या, शास्त्रहत्याका विरोध करती है, परन्तु सेवक कहे जानेवाले सरकारी अधिकारी उसकी कुछ भी परवा नहीं करते । कहनेके लिये आज दास या गुलामी-प्रथा समाप्त हो गयी, परन्तु खास साम्यवादी देश रूसमें ही विरोधियोके साथ दासो एव गुलामोसे भी अधिक बुरा व्यवहार किया जाता है । कहनेके लिये भारतमें बेगारी-प्रथा समाप्त हो गयी, किंतु वही श्रमदानके रूपमें जोरोंसे प्रचलित है, जिसे इच्छा न होनेपर भी करना पड़ता है। बड़े-बड़े अध्यापक, प्रिंसिपल तथा उच्च श्रेणीके लोग इच्छा न रहनेपर भी सरकारी आज्ञानुसार श्रमदानमें लगते ह । इतना ही नहीं, कहीं तो झूठे तौरपर ही रजिस्टरोंकी खाना पूरी की जाती है । प्राचीनकालमें बड़े-बड़े राजा-महाराजा भी अपने आपको ईश्वरका, महापुरुषोका, भगवद्भक्तोका दास बननेमे गौरव अनुभव करते थे । धर्मराज

३४० मार्क्सवाद और रामराज्य युधिष्ठिरको हरिदासवर्य कहा जाता था—'हरिदासस्य राजर्षेः' (श्रीमद्भा० १०।७५।२७)। वैष्णवोंमें बड़े-बड़े महापुरुष अपनेको दासानुदास कहते है । तथापि यहाँ स्वामी भगवान्, गुरुजन दासोंके शोषक नहीं होते । वे दासोंको कृतकृत्य करनेवाले होते थे । साक्षात् भगवान् विष्णु कहते हैं कि मैं भक्तोंके परतन्त्र हूँ—'अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज' (श्रीमद्भा० ९ । ४ । ६३) । आजका दासत्वसे मुक्त कहा जानेवाला नागरिक अन्न एवं वस्त्रके लिये तड़पता हुआ मरता है । जब वह काम करने लायक नहीं रहता तो उसका बेटा-पोता भी उसे नहीं पूछता । पर दासत्व-प्रथा- कालमे भी दास भले काम करने लायक न हो, उसके और उसके कुटुम्बका उत्तरदायित्व उसके स्वामीपर रहता था । रहा यह कि उत्पादन साधन-पूँजी बढानेका उत्तरोत्तर प्रयत्न बढता है, तो अगर यह औद्योगिक विकास गुण है, तब तो भला ही है । आज भी ऐश-आरामसे धन बचाकर उत्पादन-वृद्धिके काममें लगाना गुण समझा जाता है । रामराज्यवादी तो फिर भी महायन्त्रोंके निर्माणपर प्रतिबन्ध लगाना उचित समझता है, परन्तु मार्क्सवादी तो महायन्त्रोंका उत्तरो- त्तर विकास ही चाहता है । यदि मुनाफाका विस्तार एवं विकास न होता तो आजकी वैज्ञानिक उन्नति भी असम्भव हो जाती। फिर रामराज्यकी दृष्टिमे तो सदा ही काम-दाम-आरामका उचित वितरण आवश्यक है । श्रमके अनुसार दाम आरामकी व्यवस्था तो होनी ही चाहिये, किंतु कभी यदि व्यक्ति श्रमके लायक न रहे तो भी मनुष्यता- के नाते उसके भी दाम-आरामकी व्यवस्था होनी चाहिये और वह दास-प्रथाके समय भी थी । वस्तुतः उस समयके ये दास नाममात्रके ही दास थे । वे तो कुटुम्बके एक प्रकार सदस्य समझे जाते थे । इसीलिये कुटुम्बपति ऐसे दासोंकी भोजन-व्यवस्थाके अनन्तर ही अपने भोजन-वस्त्रकी व्यवस्था करता था । उसके भोजन करनेपर ही कुटुम्बपति भोजन करता था । पूँजीवादके समाजमें पैदावारका काम पूँजीके आधारपर होता है । पूँजीपतिके पास पैदावारके जितने साधन हैं, वे सब उसकी पूँजी हैं। पूँजीवादके समर्थक कहते हैं—'यदि पूँजीवादी प्रणालीको समाजसे हटा दिया जायगा, पूँजी न रहेगी, मुनाफा कमानेकी प्रणाली न रहेगी तो समाजमें पैदावार बढ़ाने- के लिये साधनोंको किस प्रकार बढ़ाया जायगा ?' परंतु मार्क्सवादके अनुसार वही धन पैदावारका साधन, पूँजी है, जिससे मुनाफा कमाया जाता है । जिससे उपयोगके पदार्थ तैयार किये जाते हैं, वह धन पूँजी नहीं है ।' जो भेद पदार्थ एवं सौदेमें है, वही भेद पैदावारके साधनों और पूँजीमें है । गेहूँकी बोरी यदि परिवारके व्यवहारके उपयोगके लिये है तो वह उपयोग पदार्थ है और यदि वह बिक्रीके लिये है तो वह सौदा है । कोई भी वस्तु सौदा

है या पदार्थ वह इस बातपर निर्भर करता है कि वह वस्तु किस प्रयोजन या उपयोगमें आयगी ? इसी प्रकार पैदावारके साधनोंके बारेमें भी उनका प्रयोजन यह निश्चय करता है कि वह जरूरत पूरी करनेका साधन है या मुनाफा कमानेका साधन ? किसी मशीनसे यदि उपयोग पदार्थ बनाये जाते हैं, तो वह पैदावार साधन तो अवश्य है, पर मुनाफा कमानेका साधन नहीं । अतः मार्क्स उसे पूँजी नहीं कहता । परंतु यदि उस मशीनपर दूसरे लोगोंसे श्रम कराकर मुनाफा कमाया जायगा तो वह पूँजी कहलायेगा । समाजवादी समाजमे बड़ी-बड़ी मिलें रहेंगी, पैदावार और नये साधन जारी करनेके लिये बड़ी मात्रामे धन इकट्ठा किया जायगा । परंतु उसका उद्देश्य व्यक्तियों या श्रेणियोंके लिये मुनाफा कमाना न होकर जनताके उपयोगके लिये उपयोगी पदार्थ और साधन पैदा करना होगा । इसीलिये वह पूँजी न कहलायेगा । वह होगा समाजकी आवश्यकताओंको पूरा करनेका साधन-धन । वस्तुतः उपयोग पदार्थ एवं सौदामे भी पारमार्थिक भेद नहीं है । उपयोग, उद्देश्य या प्रयोजनके भेदसे पदार्थमें भेद नहीं हो सकता । वही विष चन्द्रोदय आदि औषध बनानेके काम आता है, वही मृत्युके काममे आता है । यह सदुपयोग-दुरुपयोगका भेद है । बिजलीमे प्रकाश भी होता है, दूसरे भी कितने काम होते हैं, मृत्यु भी हो जाती है । फिर भी बिजली बिजली ही रहती है, उसमें मौलिक अन्तर नहीं होता । गेहूँकी बोरी स्वार्थ भी हो सकती है, परार्थ भी, किंतु इससे गेहूँकी बोरीमें अन्तर नहीं आता । इसी तरह उपयोग या मुनाफेके लिये गेहूँकी बोरीमे प्रयोग-भेद होनेपर भी उसमें कोई अन्तर नहीं होता । बड़े-बड़े साधनोंके लिये बड़ी मात्रामें धन जुटाना आवश्यक ही होगा । फिर डाका डालकर, छीना-झपटीकर, जबरदस्ती टैक्स लगाकर, इगालवृत्तिसे धन नहीं बटोरना है तो उचित मुनाफाद्वारा ही साम्यवादी सरकारको भी धन जुटाना होगा । नीतिशास्त्रोंका मत है कि इगालकार ( कोयला बनानेवाले ) की वृत्तिसे ( अर्थात् जैसे वह वृक्षको जड़-मूलसे काटकर उसे जलाकर कोयला बनाता है उसी तरह ) प्रजाको लूटकर, उसकी भूमि सम्पत्ति छीनकर धन- संग्रहकी नीति न अपनायी जाय, मधुकर-वृत्तिसे ही धनसंग्रह उचित है । जैसे मधुमक्खी वृक्षों, पौधों, पुष्पों, स्तबकों, फलोंको बिना नष्ट किये ही उनमेंसे रस-संग्रहकर मधु बना लेती है, उसी तरह प्रजाको बिना नष्ट किये ही उसकी सम्पत्तिको बिना छीने ही आवश्यक धन-संग्रह करना उचित है । व्यापार-कौशलसे प्राणी मृतमृत्तिकामात्रके आधारपर धनवान् बन सकता है ( देखिये पृष्ठ ३४७ ) । इससे किसीका नुकसान भी नहीं होता

३४२ मार्क्सवाद और रामराज्य और धनसंग्रह भी हो जाता है । कई स्थानोंमे मूर्खतावश सरकारें गरीबोंकी गाढ़ी कमाईका लाखो रुपया खर्च करके भी कोई लाभ नहीं उठा पातीं । भाखरा आदि बाँधोंके भ्रष्टाचारोंकी कहानियाँ अभी ताजी ही हैं । ऐसे उदाहरण कितने हैं । जैसे कोई मतवादी या सरकारें धनसंग्रहका उद्देश्य प्रजाका उपयोग बताकर पूँजी एवं पैदावारके साधनोंके भेद सिद्ध करनेका प्रयत्न करती है, उसी तरह मुसोलिनी तथा हिटलर सम्पत्ति बढ़ानेके नामपर दूसरे राष्ट्रोंको कुचलकर उनपर अधिकार जमाना उचित समझते थे । वैसे ही मार्क्सवादी पैदावारके साधन संग्रहके नामपर प्रजाकी वैधसम्पत्तियोंका भी अपहरण करते हैं । दान, इनाम तथा क्रयद्वारा मिली, दायमे मिली बपौती सम्पत्तियोंको भी छीन लेते हैं । कई सद्गृहस्थ अपनी सम्पूर्ण कमाईको धर्मार्थ, परोपकारार्थ ही लगाते है । रामराज्यकी दृष्टिसे कमाईका यही सदुपयोग है । सत्पुरुषोंकी विद्या ज्ञानके लिये, धन दान तथा परोपकारके लिये होता है । खलकी विद्या विवाद, धन घमण्ड एव शक्ति परोत्पीड़नके लिये होती है-- विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीड़नाय । खलस्य साधोर्विपरीतमेतज् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ॥ (गुणरत्नम् ७) ऐसी स्थितिमे रामराज्यके अनुसार वैध धनोपार्जन प्रथम दानार्थ, परोपकारार्थ, यज्ञार्थ है, पश्चात् भोगार्थ । मुनाफा कमानेका भी उद्देश्य यज्ञार्थ- परोपकारार्थ ही है । अतः समाजवादी अर्थ-व्यवस्था सिवा अपहरण और लूट- पाटके और कोई व्यवस्था नहीं है । इसके अनुसार जनता धनहीन, धर्महीन, शक्तिहीन होकर मुट्ठीभर तानाशाहोंकी गुलाम बन जाती है । दासोंकी-जैसी भी स्वतन्त्रता उसे नहीं मिलती । बोलने, विचार व्यक्त करने, अपनी कमाईका सदुपयोग करनेके अधिकार भी जनतासे छिन जाते हैं । मनु, शुक, बृहस्पति, कामन्दक, कौटल्य, सुकरात, अरस्तू, अफलातून सभी जान-मालकी रक्षा राज्यविधानका उद्देश्य मानते हैं, किंतु मार्क्सवादी व्यवस्थामे राज्य ही जान-मालका विध्वंसक बन जाता है । जनताकी स्वतन्त्रता सर्वथा नष्ट हो जाती है । लेनिन एव स्टालिन बड़े गर्वके साथ कहा करते थे कि 'रूसमें गैरसरकारी पार्टीका न होना दूषण नहीं भूषण है । जिन देशोंमे वर्गभेद विद्यमान होते हैं, उनमे विभिन्न वर्गोंकी प्रतिनिधित्व करनेवाली अनेक राजनीतिक पार्टियाँ अपेक्षित हो सकती हैं, किंतु रूसमे तो वर्गभेद समाप्त हो चुके हैं, फिर तो यहाँ किसी अन्य राजनीतिक पार्टीका न होना गुण ही है । पर उनका यह गर्व सिवा दम्भके और कुछ नहीं था । वस्तुतः पुलिस-पल्टन तथा गुप्तचर विभागका जाल बिछा- कर, मतभेद रखनेवाले लोगोंकी जबानपर ताला लगाकर उसे दबा रखा गया था । यदि वहाँ वर्गोंका अवशेष न होता, तो लेखन-भाषण एवं प्रेसो तथा

पत्रोंकी स्वतन्त्रतापर प्रतिबन्ध क्यो लगा रखा जाता ? यदि विरोधीवर्ग नहीं थे तो खतरा किससे था ? प्रेसो, पत्रोंकी स्वतन्त्रता आज संसारके सभी देशोमें मान्य है, पर रूसमें उसकी भी स्वतन्त्रता नहीं। वहाँ कोई व्यक्ति सरकारके विरुद्ध न भाषण दे सकता है, न लेख ही लिख सकता है और न कोई सरकारके विरुद्ध नोटिस-पोस्टर निकाल सकता है। फिर स्वतन्त्र अखबार निकालना, सरकारी पार्टीके विरुद्ध चुनाव आदि लडना तो दूरकी बात है। नाटकके लिये मतगणनाके समय सरकारी प्रेरणासे कुछ स्वतन्त्र व्यक्ति खड़े हो जायें, यह अलग बात है। ऐसी स्थितिमें यह कहना कि 'रूसमें वर्गभेद समाप्त हो गया है और वहाँ दूसरी राजनीतिक पार्टीका न होना भूषण है', सिवा दम्भके और क्या है ? लेनिन तथा स्तालिनने संक्रमणकालके नामपर रूसी समाजवादी शासनमें सर्वहाराके डिक्टेटरशिपका जोरदार समर्थन किया था। इन डिक्टेटरोके भीषण डिक्टेटरशिपमें कटकशोधनके नाम एक-एक विरोधियों चुनकर समाप्त कर दिया गया था । ट्राटस्की, बुखारिन आदि हजारो कामरेड तथा उनके लाखो अनुयायियोको मौतके घाट उतार दिया गया था। स्तालिनके विरोधियोकी इन बातोको मिथ्या प्रचार कहकर उन काले कारनामोको छिपानेका प्रयत्न किया जाता था। परन्तु अब खुश्चेव तथा बुल्गानिन जो स्तालिनके पक्के अनुयायी थे, उसके भीषण डिक्टेटरशिपकी निन्दा कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि १९३६ से १९३८ तक पाँच हजारसे अधिक उच्च सोवियत अधिकारियोको नष्ट कर दिया गया था। स्तालिनके चित्रोको हटाने और उसके प्रति श्रद्धा-भक्ति मिटानेका यत्न कर रहे हैं। वस्तुतः यह तो मार्क्सवादी व्यवस्थाका ही दोष है। जहाँ ईश्वर और धर्मका सम्मान नहीं होगा, लोगोको लिखने, बोलनेकी आजादी न होगी, वहाँ भीषण डिक्टेटरशिपका होना अनिवार्य है। स्वयं बुल्गानिन तथा खुश्चेव भी डिक्टेटर ही हैं। बेरियाको गोली मारकर मालेनकोवको पार्टी एव शासनसमितिके प्रधान पदसे हटाकर मोलोटोवको दबाकर अपने अधिकारोको दृढ रखना ही उनका लक्ष्य था। इसके लिये अभी भीषण उलट-फेर एव हत्याओकी आवश्यकता पड सकती है। जैसे स्तालिनने लेनिनके अनुयायियोको नष्ट किया था, अब उसी प्रकार स्तालिनके साथियोका सफाया करनेका प्रयत्न चल रहा है। अधिकार-प्राप्तिके लिये चलनेवाले इन सघर्षोंका कभी भी अन्त नहीं हो सकता । जर्मनीके हिटलरका नात्सीवाद, इटलीके मुसोलिनीका फासिस्टवाद, रूसी समाजवादियोका डिक्टेटरवाद सब एक-ही-जैसा है। भारतमें भी समाजवादी ढगकी समाज-रचनाका प्रयत्न चल रहा है, जिसका अन्तिम रूप यही डिक्टेटरशिप होनेवाला है। व्यक्तियोकी भूमि, सम्पत्ति, उद्योग छीनकर उन्हें विरोधी शक्तिरहित बनानेका भीषण षड्यन्त्र चल रहा है। अध्यादेशी आर्डिनेन्सो-

३४४ मार्क्सवाद और रामराज्य द्वारा जीवन-बीमा-कम्पनी-जैसी एक-एक वस्तुका सरकारीकरण हो रहा है । एक संसद्-सदस्यने बताया कि यदि अधिवेशनोंके दिन निकाल दिये जायें तो प्रतिदिन एक अध्यादेशका औसत पड़ता है । इस तरह भारतका वर्तमान काँग्रेसी शासन भी डिक्टेटरशिपकी ओर ही बढ़ रहा है । विरोधियोंके दमन करनेकी नीतिमे यहाँ भी तेजी आ रही है । भारतमे उस मार्क्सवादका विस्तार होने जा रहा है जिसमे आत्मा- परमात्माका खण्डन किया जाता है । शून्यवादी तो जड़-चेतन सभीका खण्डन करके शून्यताका ही प्रतिपादन करते थे । आस्तिकोने उनका खण्डन कर आत्मा और परमात्माका अस्तित्व प्रतिपादित किया । आज भी दृढ अध्यवसायके साथ विचार करनेसे मार्क्सवादकी निस्सारता स्पष्ट हो जाती है । अर्थपरायण प्राणी अर्थको ही सबका मूल समझता है । जहाँ धार्मिक, आस्तिक लोग धर्मको ही सम्पूर्ण जगत्की प्रतिष्ठा कहते हैं, वहाँ चार्वाकोंका अनुसरण करते हुए मार्क्सवादी अर्थको ही सम्पूर्ण जगत्की प्रतिष्ठा कहते हैं । 'धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा' के मुकाबिलेमे 'अर्थो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा' कहते हैं । अर्थका माहात्म्य महाभारतादि ग्रन्थोंमें पर्याप्तरूपोमे वर्णित है । तथापि आस्तिकजन अर्थका भी मूल धर्मको ही मानते हैं । इसी अभिप्रायसे कहा गया है '—धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते ।' धर्मसे ही अर्थ एव कामकी भी प्राप्ति होती है । देखते ही हैं बड़े- बडे अर्थशास्त्री हजारो प्रकारके प्रयत्न करते हुए भी भाग्यहीन होनेसे दरिद्र ही बने रहते है । स्वयं मार्क्स ही इसका उदाहरण है । मार्क्स जितना अर्थ- शास्त्रका विचार कर सका उतना अर्थार्जन नही कर पाया । जैसे निपुण चिकित्सकके लिये रोगी रहना एक विडम्बना ही है, वैसे ही एक अर्थनिष्णातका अर्थविहीन दशामे पडे रहना भी विडम्बना ही है । अतः धर्ममूलक ही अर्थ काम भी होते है । श्रम और मुनाफा कहा जाता है कि 'पूँजीपतिके हाथमे पूँजी होनेके कारण पैदावारके साधन उसके हाथमें चले जाते हैं। पूँजीसे पूँजी ही पैदा होती है । यह पूँजी भी शोषणसे इकट्ठी होती है। बड़े परिमाणमे मुनाफेके लिये पैदावार आरम्भ होनेसे पहले मामूलीरूपसे व्यापार चलता है, उपयोगकी वस्तुओको सस्ते दामसे खरीदकर अधिक दाममे बेचकर मुनाफा कमाया जाता है, उन्ही व्यापारोसे पूँजी एकत्रित होती है । सस्ता खरीदकर मँहगा बेचनेका अर्थ होता है या तो सौदेका दाम उचित नहीं दिया गया या उचित मूल्यसे अधिक मूल्य लिया गया । इस तरह मुनाफेकी अधिक गुञ्जाइश नही रहती, परंतु परिश्रम करनेकी शक्ति ही ऐसी वस्तु है जिसके

मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३४५

खरीदनेके बाद और बेचनेमे पहले वह बढ़ जाती है अथवा अधिक उपयोगी पदार्थ पैदा करती है । 'बाजारमे बिकनेवाली हर वस्तुका दाम होता है और वह उस वस्तुकी तैयारीमे खर्च किये गये परिश्रमके समयसे निश्चित होता है। इसी आधारपर बाजारमे बिकनेवाली मजदूरी या परिश्रम-शक्तिका भी दाम निश्चित होता है । मजदूरको उस श्रमशक्तिको प्राप्त करनेके लिये अन्न, वस्त्र, सौदा—खरीदना पडता है, जिसके बिना परिश्रम सम्भव नहीं होता । यद्यपि मजदूर अपने जीवनके लिये अधिक भी खर्च कर सकता है, परन्तु उसे अधिक खर्च करनेको मिलता ही नहीं । मालिक लोग कम-से-कम दाममें उसे खरीदनेका प्रयत्न करते हैं । इस तरह मालिक लोग मजदूरको कम देकर उससे ज्यादा-से-ज्यादा काम लेते हैं । मजदूरद्वारा खर्च किये गये सौदे और मजदूरद्वारा पैदा किये गये सौदेके दाममे जो अन्तर है, वही पूँजीपतिका मुनाफा बन जाता है ।' शक्ति एव उसके परिणाममे भेद है । मजदूरकी जीवनरक्षाके लिये कम- से कम जरूरी सौदेका दाम ही परिश्रम-शक्तिका दाम होता है। मालिक जितने दिनतक मजदूरकी परिश्रम-शक्तिको अपने काममे लाना चाहता है, उतने दिन- तक जीवित रखनेके लिये सौदेका मूल्य देनेके लिये विवश है । वह कहीं एक रुपया रोज, कहीं पाँच रुपया रोज मजदूरी पाता है। वही परिश्रमशक्तिका मूल्य है । वेतनमे दिया 'हुआ धन ही दत्त समझा जाता है। दबाव या बलात्कारसे बाध्य होकर देनेपर भी वह अदत्त ही समझा जाता है। उसे न्यायालयद्वारा लौटाया जा सकता है— भृतिस्तुष्ट्या पण्यमूलं स्त्रीशुल्कमुपकारिणे । श्रद्धाऽनुग्रहसम्प्रीत्या दत्तमष्टविधं स्मृतम् ॥ ( या० स्मृ० २ । १७६ की वीरमित्रोदय टीकामें उद्धृत बृहस्पतिका वचन ) दत्तधन आठ प्रकारका होता है, भृति अर्थात् वेतनके रूपमे मिला हुआ, तुष्टिमे मिला हुआ, सौदेके दामरूपसे मिला हुआ, स्त्रीशुल्करूपमे दिया हुआ, उपकारीको दिया हुआ, श्रद्धासे दिया हुआ, अनुग्रहसे दिया हुआ और प्रसन्नतासे दिया हुआ । इन्हे लौटाया नही जा सकता । कही-कही सात प्रकारके दान अप्रत्यावर्तनीय कहे गये हैं और सोलह प्रकारके दान प्रत्यावर्तनीय— दत्तं सप्तविधं प्रोक्तमदत्त षोडशात्मकम् । पण्यमूल्यं भृतिस्तुष्ट्या स्नेहाद्धर्म्युपकारितम् । स्त्रीशुल्कानुग्रहार्थं च दत्त दानविदो विदुः ॥ अदत्त तु भयक्रोधशोकवेगरुजान्वितै । तथोत्कोचपरीहासव्यत्यासच्छलयोगतः ॥ बालमूढास्वतन्त्रार्तमत्तोन्मत्तापवर्जितम् । कर्ता ममायं कर्मेति प्रतिलाभेच्छया च यत् ॥ अपात्रे पात्रमित्युक्ते कार्ये चाधर्मसंहिते । यद्दत्तं स्यादविज्ञानाददत्तं तत् प्रकीर्तितम् ॥ ( नारदस्मृति ४ । ३, ७—१० )

खरीदी हुई वस्तुका दिया हुआ मूल्य दत्त है, अप्रत्यावर्तनीय है। काम करनेवाले नौकरको दिया हुआ वेतन, बंदी-मागधादिको प्रसन्नतासे दिया हुआ, पिता-पुत्रादिको स्नेहसे दिया हुआ तथा उपकार करनेवालेको जो प्रत्युपकाररूपसे दिया जाता है, विवाहके लिये जो कन्यापक्षवालोको दिया जाता है, जो किसी- पर कृपा करके दिया जाता है—ये सभी दान दत्त ही हैं, लौटाये नही जा सकते। भयसे, क्रोधसे, शोकावेशसे तथा असाध्यरोगादिसे पीड़ित दशामे, परिहासवश, व्यत्यास (उल्टा-पल्टा) से, छलयोगसे, बाल (नाबालिक) सोलह वर्षसे कम उमरवालेद्वारा, मूढ़ (लोकव्यवहारानभिज्ञ), अस्वतन्त्र (पुत्र दासादि), आर्त्त (रोगाभिभूत), मत्त (मादक द्रव्यसे, मतवाला), उन्मत्त (वातिक, उन्माद- ग्रस्त) द्वारा दिया हुआ, किसी कार्य करानेके प्रतिलाभकी इच्छासे, अपात्रको पात्र बतला देनेसे, अवेदविद्को वेदविद् कहनेसे, यज्ञके नामसे धन लेकर जुए आदिमे खर्च करनेवालेको जो दिया गया हो—ये सोलह प्रकारके दान दत्त भी अदत्त ही समझे जाने चाहिये। जो अदत्तको लेता है और जो अदेय वस्तुको देता है—ये दोनो ही दण्ड्य हैं। भूमिपर भूमिपतिका अधिकार भी शास्त्रोने माना है। किसीकी भूमिपर मकान बनाकर जो भाड़ा देकर रहता है, वह यदि वहाँसे हटे तो अपना 'तृण, काष्ठ, इष्टिका (ईंट) आदि ले जा सकता है। परंतु जो भाड़ा बिना दिये किसीकी भूमिमे घर बनाकर रहता है, वह हटनेके समय घास, लकड़ी या ईंटोको नही ले सकता। परभूमौ गृहं कृत्वा स्तोमं दत्त्वा वसेत्ततः। स तद् गृहीत्वा निर्गच्छेत्तृणकाष्ठानि चेष्टकाम्॥ स्तोमाद् विना वसित्वा तु परभूमावनिश्श्रितः। निर्गच्छंस्तृणकाष्ठादि न गृह्णीयात् कथंचन°॥ (कात्यायनस्मृ० सारोद्धार) मार्क्सके अनुसार 'परिश्रमका दाम मालिकका मुनाफा ही है। पूँजीपति इमारत बनाकर, मशीन लगाकर, कच्चा माल खरीद लेता है, फिर भी जबतक मजदूर- की परिश्रमशक्ति उसमे नही लगती तबतक काम आरम्भ नहीं होता। अतः वह मजदूरके शरीरको किरायेपर लेकर उससे सौदा बनवाता है। यदि पाँच दिनतक सौदा बनानेका काम हुआ और उतने समयमे इमारत और मशीनका किराया, कच्चे मालका दाम तथा अन्य कामोमे जो खर्च हुआ है, वह तीन हजार घंटेके बराबर था। पूँजीपतिने बीस मजदूरोको प्रतिदिन दस घंटे कामपर लगाया और- सौदा तैयार होनेपर सौदेका दाम बाजारमें चार हजार घंटे परिश्रमके दामक बराबर पडा, तो तीन हजार घंटेके परिश्रमका दाम पूँजीपतिने खर्च किया ही है। मकान, मशीन आदिके किराये आदिपर और एक हजार घंटेके परिश्रमके दामकी बचत होती है, यह बचत ही परिश्रमका दाम है। उसमेसे मालिक मजदूरको एक हजार घंटे जीनेके लायक ही नौकरी देता है। यह एक हजार

मार्क्सकीय अर्थ-व्यवस्था ३२७ घंटेतक परिश्रम करनेकी शक्तिका दाम होगा और उसे जो बाजारमें मिला वह एक हजार घंटे परिश्रमका दाम है। 'यदि पूँजीपति मजदूरको पाँच दिनतक दस घंटे परिश्रम करनेकी शक्तिका दाम ढाई दिनके परिश्रमके बराबर देता है तो उसे प्रति मजदूर ढाई दिनका परिश्रम मुनाफेमें बच जाता है। उसका कुल मुनाफा चार दिनके परिश्रमका परिणाम हो जाता है। अर्थात पूँजीपतिने अपने बीस मजदूरोंको उतना रूपया दिया जिससे वे पाँच दिन जीवित रहें और मजदूरोंने मालिकको उतना रूपया दिया जितना कि बीस आदमियोंकी पाँच दिनकी मेहनतसे पैदा होता है। "जैसे घोड़ेके दिनभर परिश्रम करनेके योग्य बनाये रखनेके लिये घास-दाना- में जो खर्च होता है, वह उसकी परिश्रमशक्तिका दाम है। घोड़ेकी दिनभरके परिश्रमसे जो कमायी होती है, वह उसके परिश्रमका दाम होता है। दोनोंमें जो अन्तर है, वही मुनाफा है। परिश्रमशक्तिको बनाये रखनेमें जो खर्च होगा, वह परिश्रम के दामसे कहीं कम होता है। इसी तरह मजदूरकी परिश्रमशक्तिका पूरा दाम मिलनेपर भी परिश्रमके दामसे वह बहुत कम होता है। परन्तु मजदूरोंकी संख्या बाजारमें अधिक होती है। आधा पेट खाकर परिश्रमशक्तिका दाम भी उचित (मुनासिब) से कम लेकर मजदूरी करते हैं। गांठकी पैदावारसे मजदूरको जितना ही कम मिलता है, उतना ही मालिकका मुनाफा बढ़ता है।" देशकालके भेदसे भावोंमें भेद हो जाता है। जिस देशमें जिस वस्तुकी अधिक आवश्यकता या माँग होती है, अन्यत्र कम दाममें खरीदी वस्तु वहाँ अधिक दाममें बिकती है। दिखाया जा चुका है कि किसी देशकालमें पानी भी कीमती हो जाता है, इसीलिये कालान्तग्में खरीदी वस्तु कालान्तरमें और देशान्तरमें खरीदी वस्तु देशान्तरमें बेचनेकी लाभके ही लिये पद्धति चलती है। बुद्धिकी विशेषतासे भी लाभमें विशेषता होती है। कथासरित्सागरकी कथा है कि एक व्यक्तिने एक मृतमूषिकाको, जो सामान्य दृष्टिसे व्यर्थ ही कही जाती है, लेकर व्यापार करनेका निश्चय किया। किसीने एक आना पैसा देकर उसे अपनी बीमार बिल्लीके लिये खरीद लिया। वह उसी पैसेसे भुना चना खरीदकर शीतल जल लेकर मार्गके किसी वृक्षकी ठंढी छायामें बैठ गया। लकड़ीका बोझ लेकर आते हुए भूख-प्यासे लकड़हारोंने वहीं रुककर और चना खाकर जलपान किया तथा बदलेमें वे उसे थोड़ी-थोड़ी लकड़ियाँ देते गये। उन लकड़ियोंके बेचनेसे उसे पाँच रुपये प्राप्त हो गये। उसमें उसने कुछ तो अपने भोजनमें व्यय किया और शेषका पुनः चना खरीद लिया। इसी प्रकार उनसे उसे पुनः लकड़ियाँ मिलीं और शनैः-शनैः वह महाधनवान् हो गया। फिर जिसके पास पूँजी हो उसमे तो वह बहुत कमा सकता है।

४. चतुर्थ खण्ड: वैदिक वर्णाश्रम-धर्म, सर्वकल्याण, सनातन रामराज्य दर्शन एवं उपसंहार

३४८ मार्क्सवाद और रामराज्य जब कोई व्यापार न कर अपना धन बैंकमें जमा करता है तो वहाँ भी सूदके रूपमें कुछ-न-कुछ आमदनी होती है। फिर श्रमपूर्वक व्यापार तो कुछ अधिक लाभके लिये किया ही जाता है। देश-विशेष तथा काल-विशेषमें माँग बढ़ जानेसे दाम बढ़ जाता है। इसमें श्रमका सन्निवेश नहीं होता। पूर्वोक्त कथामें मृतमृत्तिकाके व्यापारमें श्रमकी कोई बात नहीं आयी, पर अवसर-विशेष- पर ऐसी वस्तुओंका भी दाम मिल जाता है। इसी तरह खेतीसे तथा अन्य उपयोगी वस्तुओंको बनाकर बेचनेसे भी लाभ होता है। यहाँ सौदेका दाम कम देने अथवा उचितसे ज्यादा दाममें बेचनेका कोई प्रश्न ही नहीं उठता। क्योंकि देश तथा कालकी महिमासे दाममें चढ़ाव-उतार होता ही रहता है। इसी तरह 'प्रत्येक वस्तुका दाम वस्तुकी तैयारीमें खर्च किये गये परिश्रमके समयसे निश्चित होता है', यह कथन भी असंगत है। क्योंकि आम्रादि फलोंका दाम उनकी मधुरता, हृद्यता आदि गुणोंपर तथा दुर्लभता, सुलभता आदि एवं माँगके आधारपर ही निश्चित होता है। परिश्रम समान होनेपर भी घटिया आमोंका उतना दाम नहीं होता। अतः उपकारकता तथा दुर्लभताके तारतम्यका ज्ञान ही वस्तुके मूल्यमें कारण होता है। हीरा-जैसी वस्तुमें भी उपकारकत्व दुर्लभत्वका ज्ञान न होनेसे अल्पमूल्यता या हेयताका व्यवहार हो सकता है। वकरी एवं गर्दभ, उष्ट्रके पालनमें श्रम एक-सा होनेपर भी वस्तुओंकी विशेषतासे ही दाममें विशेषता कहनी पड़ती है। इसी तरह परिश्रमके समयके आधारपर भी दामका निर्णय असंगत है। एक मजदूर अधिक समयतक कठोर-से-कठोर काम करता है, तब भी उसे थोड़ा ही पैसा मिलता है। परंतु एक इंजीनियर, डाक्टर, वकील मिनटोंमें हजारों रुपया प्राप्त कर लेता है। अतः यहाँ भी परिश्रमकी विशेषता तथा दुर्लभताके आधारपर ही दाममें विशेषता मान्य होनी चाहिये। वस्तुतः सफल कर्म ही श्रम है। देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अहङ्कारकी हलचल ही कर्म है। तथा च फलोत्पादनानुकूल उपयोगी हलचल ही श्रम है। यह स्वयं ही अनेक प्रकारकी होती है, एक रूप नहीं है। एक विशिष्ट वकीलकी वाणीकी हलचल बहुत लाभदायक होती है, अतः उसका दाम बहुत ज्यादा होता है। एक साधारण वकील या वक्ताकी वाणीसे उतना लाभ नहीं होता, अतः उसका साधारण ही दाम मिलता है। इसी तरह इंजीनियर, डाक्टर आदिके सम्बन्धमें भी कहा जा सकता है। विशिष्ट बुद्धि, विशिष्टवाणी, विशिष्ट हस्तपादादि क्रियाओने होनेवाले फलोंके आधारपर उनके दामोंमें भी कमी-वेशी होती रहती है। दुर्लभता एवं माँगकी विशेषता ही सर्वत्र दामका कारण हुआ करती है। जैसे विशिष्टबुद्धियुक्त शारीरिक हलचल अधिक लाभदायक होती है उसी तरह

मशीन कच्चा माल तथा विशिष्टबुद्धियुक्त शारीरिक हलचल (श्रम) और लाभ- दायक होती है। जिसके पास उपर्युक्त साधनोंमें जितनी कमी है उतना ही उसे कम लाभ होता है। जैसे इस जन्म या जन्मान्तरके शुभकर्मसे जिसके पास उत्तम बुद्धि एवं कायिक, वाचिक उत्तम कर्म होते हैं, उसको केवल कायिक कर्मवालोंकी अपेक्षा अधिक फल मिलता है। इस तरह इस जन्म या जन्मान्तरके शुभकर्मसे भूमि, मशीन, कच्चा माल आदि जिसके पास हैं, उसे और भी बड़ा फल प्राप्त होता है। किसीके पास बुद्धि नहीं है, केवल स्थूल श्रम है, उसे थोड़ा ही फल मिलता है। किसी वकील, डाक्टर, इंजीनियर आदिमें बाह्य श्रम अत्यल्प है, केवल बुद्धिके ही बलपर उन्हें पर्याप्त धन मिलता है। किसीके पास मशीन, भूमि आदि बाह्य साधनोंकी प्रधानता है, वे उसके सहारे साधारण बुद्धि, वाणी एवं शरीरके कर्मसे ही बड़ा फल पा लेते हैं। इसमें भी अवसरका महत्त्व होता है। किसी अवसर- पर कोई वाणी, कोई औषध कोई क्रिया लाभदायक होती है। किसी अवसर- पर वही हानिकारक भी हो जाती है। शास्त्रीय कर्मोंमें भी अवसर तथा जानकारी- का विशेष महत्त्व है। डाक्टर, इंजीनियर, गणक, वकील आदिके भी जानकारी तथा कर्मोंकी विलक्षणताके समान ही वैदिक, तान्त्रिक, ज्योतिष्टोम, अश्वमेध, षडध्वशोधनादि कर्मोंमें भी ज्ञानक्रिया आदिकी विलक्षणता होती है। पाठ, जपमें श्रम समान होनेपर भी किसी मन्त्र-स्तोत्रके जप, पाठसे सामान्य फल होता है, किसी मन्त्र-स्तोत्रके जप, पाठसे विशिष्ट फल होता है। यहाँ श्रमकी विशेषता न होकर वस्तुकी विशेषतासे ही फलमें विशेषता मान्य होती है। परिश्रम, शक्ति एवं परिश्रमका भेद भी अवास्तविक तथा अनुपयुक्त है। वस्तुतः खरीदार फलके आधारपर ही दाम देता है। फलोत्पादक शक्तिका कुछ भी दाम नहीं होता। काम न करनेवाले या अन्यका काम करनेवाले श्रमिकके पास भी शक्ति है, परन्तु जिसके लिये उसका फल नहीं है उसके लिये वह व्यर्थ है। अतः उसका कुछ भी दाम नहीं देता। अतः परिश्रमशक्ति एवं परिश्रमके पृथक् फलकी कल्पना निराधार है। जितनेसे परिश्रमशक्ति बनी रहे, उतना दाम परिश्रमशक्तिका दाम है, यह नियम भी व्यभिचरित है। क्योंकि वकीलों, डॉक्टरों आदिके श्रमशक्ति बनाये रखनेसे कहीं बहुत अधिक दाम मिलता है, अतः उस दामको परिश्रमशक्तिका दाम नहीं कहा जा सकता। ऐसे स्थानोंमें परिश्रमका दाम दूसरा क्या हो सकता है? क्योंकि यहाँ तो कोई वस्तु बाजारमें जानेवाली नहीं है, जिससे लागत खर्च निकालकर सौदेके दामको परिश्रमका फल कहा जा सके। वकीलके परिश्रमका परिणाम न्याय-प्राप्ति कहा जा सकता है, उसके फलस्वरूप प्राप्त होनेवाले भूमि, हिरण्य आदिमें भले वकीलके परिश्रमको भी हेतु कहा जाय, परन्तु वह वादी आदिकी निजी वस्तु ही है। उसे प्राप्त होनी ही चाहिये। तभी