भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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है या पदार्थ वह इस बातपर निर्भर करता है कि वह वस्तु किस प्रयोजन या उपयोगमें आयगी ? इसी प्रकार पैदावारके साधनोंके बारेमें भी उनका प्रयोजन यह निश्चय करता है कि वह जरूरत पूरी करनेका साधन है या मुनाफा कमानेका साधन ? किसी मशीनसे यदि उपयोग पदार्थ बनाये जाते हैं, तो वह पैदावार साधन तो अवश्य है, पर मुनाफा कमानेका साधन नहीं । अतः मार्क्स उसे पूँजी नहीं कहता । परंतु यदि उस मशीनपर दूसरे लोगोंसे श्रम कराकर मुनाफा कमाया जायगा तो वह पूँजी कहलायेगा । समाजवादी समाजमे बड़ी-बड़ी मिलें रहेंगी, पैदावार और नये साधन जारी करनेके लिये बड़ी मात्रामे धन इकट्ठा किया जायगा । परंतु उसका उद्देश्य व्यक्तियों या श्रेणियोंके लिये मुनाफा कमाना न होकर जनताके उपयोगके लिये उपयोगी पदार्थ और साधन पैदा करना होगा । इसीलिये वह पूँजी न कहलायेगा । वह होगा समाजकी आवश्यकताओंको पूरा करनेका साधन-धन । वस्तुतः उपयोग पदार्थ एवं सौदामे भी पारमार्थिक भेद नहीं है । उपयोग, उद्देश्य या प्रयोजनके भेदसे पदार्थमें भेद नहीं हो सकता । वही विष चन्द्रोदय आदि औषध बनानेके काम आता है, वही मृत्युके काममे आता है । यह सदुपयोग-दुरुपयोगका भेद है । बिजलीमे प्रकाश भी होता है, दूसरे भी कितने काम होते हैं, मृत्यु भी हो जाती है । फिर भी बिजली बिजली ही रहती है, उसमें मौलिक अन्तर नहीं होता । गेहूँकी बोरी स्वार्थ भी हो सकती है, परार्थ भी, किंतु इससे गेहूँकी बोरीमें अन्तर नहीं आता । इसी तरह उपयोग या मुनाफेके लिये गेहूँकी बोरीमे प्रयोग-भेद होनेपर भी उसमें कोई अन्तर नहीं होता । बड़े-बड़े साधनोंके लिये बड़ी मात्रामें धन जुटाना आवश्यक ही होगा । फिर डाका डालकर, छीना-झपटीकर, जबरदस्ती टैक्स लगाकर, इगालवृत्तिसे धन नहीं बटोरना है तो उचित मुनाफाद्वारा ही साम्यवादी सरकारको भी धन जुटाना होगा । नीतिशास्त्रोंका मत है कि इगालकार ( कोयला बनानेवाले ) की वृत्तिसे ( अर्थात् जैसे वह वृक्षको जड़-मूलसे काटकर उसे जलाकर कोयला बनाता है उसी तरह ) प्रजाको लूटकर, उसकी भूमि सम्पत्ति छीनकर धन- संग्रहकी नीति न अपनायी जाय, मधुकर-वृत्तिसे ही धनसंग्रह उचित है । जैसे मधुमक्खी वृक्षों, पौधों, पुष्पों, स्तबकों, फलोंको बिना नष्ट किये ही उनमेंसे रस-संग्रहकर मधु बना लेती है, उसी तरह प्रजाको बिना नष्ट किये ही उसकी सम्पत्तिको बिना छीने ही आवश्यक धन-संग्रह करना उचित है । व्यापार-कौशलसे प्राणी मृतमृत्तिकामात्रके आधारपर धनवान् बन सकता है ( देखिये पृष्ठ ३४७ ) । इससे किसीका नुकसान भी नहीं होता