भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 653

३४० मार्क्सवाद और रामराज्य युधिष्ठिरको हरिदासवर्य कहा जाता था—'हरिदासस्य राजर्षेः' (श्रीमद्भा० १०।७५।२७)। वैष्णवोंमें बड़े-बड़े महापुरुष अपनेको दासानुदास कहते है । तथापि यहाँ स्वामी भगवान्, गुरुजन दासोंके शोषक नहीं होते । वे दासोंको कृतकृत्य करनेवाले होते थे । साक्षात् भगवान् विष्णु कहते हैं कि मैं भक्तोंके परतन्त्र हूँ—'अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज' (श्रीमद्भा० ९ । ४ । ६३) । आजका दासत्वसे मुक्त कहा जानेवाला नागरिक अन्न एवं वस्त्रके लिये तड़पता हुआ मरता है । जब वह काम करने लायक नहीं रहता तो उसका बेटा-पोता भी उसे नहीं पूछता । पर दासत्व-प्रथा- कालमे भी दास भले काम करने लायक न हो, उसके और उसके कुटुम्बका उत्तरदायित्व उसके स्वामीपर रहता था । रहा यह कि उत्पादन साधन-पूँजी बढानेका उत्तरोत्तर प्रयत्न बढता है, तो अगर यह औद्योगिक विकास गुण है, तब तो भला ही है । आज भी ऐश-आरामसे धन बचाकर उत्पादन-वृद्धिके काममें लगाना गुण समझा जाता है । रामराज्यवादी तो फिर भी महायन्त्रोंके निर्माणपर प्रतिबन्ध लगाना उचित समझता है, परन्तु मार्क्सवादी तो महायन्त्रोंका उत्तरो- त्तर विकास ही चाहता है । यदि मुनाफाका विस्तार एवं विकास न होता तो आजकी वैज्ञानिक उन्नति भी असम्भव हो जाती। फिर रामराज्यकी दृष्टिमे तो सदा ही काम-दाम-आरामका उचित वितरण आवश्यक है । श्रमके अनुसार दाम आरामकी व्यवस्था तो होनी ही चाहिये, किंतु कभी यदि व्यक्ति श्रमके लायक न रहे तो भी मनुष्यता- के नाते उसके भी दाम-आरामकी व्यवस्था होनी चाहिये और वह दास-प्रथाके समय भी थी । वस्तुतः उस समयके ये दास नाममात्रके ही दास थे । वे तो कुटुम्बके एक प्रकार सदस्य समझे जाते थे । इसीलिये कुटुम्बपति ऐसे दासोंकी भोजन-व्यवस्थाके अनन्तर ही अपने भोजन-वस्त्रकी व्यवस्था करता था । उसके भोजन करनेपर ही कुटुम्बपति भोजन करता था । पूँजीवादके समाजमें पैदावारका काम पूँजीके आधारपर होता है । पूँजीपतिके पास पैदावारके जितने साधन हैं, वे सब उसकी पूँजी हैं। पूँजीवादके समर्थक कहते हैं—'यदि पूँजीवादी प्रणालीको समाजसे हटा दिया जायगा, पूँजी न रहेगी, मुनाफा कमानेकी प्रणाली न रहेगी तो समाजमें पैदावार बढ़ाने- के लिये साधनोंको किस प्रकार बढ़ाया जायगा ?' परंतु मार्क्सवादके अनुसार वही धन पैदावारका साधन, पूँजी है, जिससे मुनाफा कमाया जाता है । जिससे उपयोगके पदार्थ तैयार किये जाते हैं, वह धन पूँजी नहीं है ।' जो भेद पदार्थ एवं सौदेमें है, वही भेद पैदावारके साधनों और पूँजीमें है । गेहूँकी बोरी यदि परिवारके व्यवहारके उपयोगके लिये है तो वह उपयोग पदार्थ है और यदि वह बिक्रीके लिये है तो वह सौदा है । कोई भी वस्तु सौदा