मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४२ मार्क्सवाद और रामराज्य और धनसंग्रह भी हो जाता है । कई स्थानोंमे मूर्खतावश सरकारें गरीबोंकी गाढ़ी कमाईका लाखो रुपया खर्च करके भी कोई लाभ नहीं उठा पातीं । भाखरा आदि बाँधोंके भ्रष्टाचारोंकी कहानियाँ अभी ताजी ही हैं । ऐसे उदाहरण कितने हैं । जैसे कोई मतवादी या सरकारें धनसंग्रहका उद्देश्य प्रजाका उपयोग बताकर पूँजी एवं पैदावारके साधनोंके भेद सिद्ध करनेका प्रयत्न करती है, उसी तरह मुसोलिनी तथा हिटलर सम्पत्ति बढ़ानेके नामपर दूसरे राष्ट्रोंको कुचलकर उनपर अधिकार जमाना उचित समझते थे । वैसे ही मार्क्सवादी पैदावारके साधन संग्रहके नामपर प्रजाकी वैधसम्पत्तियोंका भी अपहरण करते हैं । दान, इनाम तथा क्रयद्वारा मिली, दायमे मिली बपौती सम्पत्तियोंको भी छीन लेते हैं । कई सद्गृहस्थ अपनी सम्पूर्ण कमाईको धर्मार्थ, परोपकारार्थ ही लगाते है । रामराज्यकी दृष्टिसे कमाईका यही सदुपयोग है । सत्पुरुषोंकी विद्या ज्ञानके लिये, धन दान तथा परोपकारके लिये होता है । खलकी विद्या विवाद, धन घमण्ड एव शक्ति परोत्पीड़नके लिये होती है-- विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीड़नाय । खलस्य साधोर्विपरीतमेतज् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय ॥ (गुणरत्नम् ७) ऐसी स्थितिमे रामराज्यके अनुसार वैध धनोपार्जन प्रथम दानार्थ, परोपकारार्थ, यज्ञार्थ है, पश्चात् भोगार्थ । मुनाफा कमानेका भी उद्देश्य यज्ञार्थ- परोपकारार्थ ही है । अतः समाजवादी अर्थ-व्यवस्था सिवा अपहरण और लूट- पाटके और कोई व्यवस्था नहीं है । इसके अनुसार जनता धनहीन, धर्महीन, शक्तिहीन होकर मुट्ठीभर तानाशाहोंकी गुलाम बन जाती है । दासोंकी-जैसी भी स्वतन्त्रता उसे नहीं मिलती । बोलने, विचार व्यक्त करने, अपनी कमाईका सदुपयोग करनेके अधिकार भी जनतासे छिन जाते हैं । मनु, शुक, बृहस्पति, कामन्दक, कौटल्य, सुकरात, अरस्तू, अफलातून सभी जान-मालकी रक्षा राज्यविधानका उद्देश्य मानते हैं, किंतु मार्क्सवादी व्यवस्थामे राज्य ही जान-मालका विध्वंसक बन जाता है । जनताकी स्वतन्त्रता सर्वथा नष्ट हो जाती है । लेनिन एव स्टालिन बड़े गर्वके साथ कहा करते थे कि 'रूसमें गैरसरकारी पार्टीका न होना दूषण नहीं भूषण है । जिन देशोंमे वर्गभेद विद्यमान होते हैं, उनमे विभिन्न वर्गोंकी प्रतिनिधित्व करनेवाली अनेक राजनीतिक पार्टियाँ अपेक्षित हो सकती हैं, किंतु रूसमे तो वर्गभेद समाप्त हो चुके हैं, फिर तो यहाँ किसी अन्य राजनीतिक पार्टीका न होना गुण ही है । पर उनका यह गर्व सिवा दम्भके और कुछ नहीं था । वस्तुतः पुलिस-पल्टन तथा गुप्तचर विभागका जाल बिछा- कर, मतभेद रखनेवाले लोगोंकी जबानपर ताला लगाकर उसे दबा रखा गया था । यदि वहाँ वर्गोंका अवशेष न होता, तो लेखन-भाषण एवं प्रेसो तथा