मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपत्रोंकी स्वतन्त्रतापर प्रतिबन्ध क्यो लगा रखा जाता ? यदि विरोधीवर्ग नहीं थे तो खतरा किससे था ? प्रेसो, पत्रोंकी स्वतन्त्रता आज संसारके सभी देशोमें मान्य है, पर रूसमें उसकी भी स्वतन्त्रता नहीं। वहाँ कोई व्यक्ति सरकारके विरुद्ध न भाषण दे सकता है, न लेख ही लिख सकता है और न कोई सरकारके विरुद्ध नोटिस-पोस्टर निकाल सकता है। फिर स्वतन्त्र अखबार निकालना, सरकारी पार्टीके विरुद्ध चुनाव आदि लडना तो दूरकी बात है। नाटकके लिये मतगणनाके समय सरकारी प्रेरणासे कुछ स्वतन्त्र व्यक्ति खड़े हो जायें, यह अलग बात है। ऐसी स्थितिमें यह कहना कि 'रूसमें वर्गभेद समाप्त हो गया है और वहाँ दूसरी राजनीतिक पार्टीका न होना भूषण है', सिवा दम्भके और क्या है ? लेनिन तथा स्तालिनने संक्रमणकालके नामपर रूसी समाजवादी शासनमें सर्वहाराके डिक्टेटरशिपका जोरदार समर्थन किया था। इन डिक्टेटरोके भीषण डिक्टेटरशिपमें कटकशोधनके नाम एक-एक विरोधियों चुनकर समाप्त कर दिया गया था । ट्राटस्की, बुखारिन आदि हजारो कामरेड तथा उनके लाखो अनुयायियोको मौतके घाट उतार दिया गया था। स्तालिनके विरोधियोकी इन बातोको मिथ्या प्रचार कहकर उन काले कारनामोको छिपानेका प्रयत्न किया जाता था। परन्तु अब खुश्चेव तथा बुल्गानिन जो स्तालिनके पक्के अनुयायी थे, उसके भीषण डिक्टेटरशिपकी निन्दा कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि १९३६ से १९३८ तक पाँच हजारसे अधिक उच्च सोवियत अधिकारियोको नष्ट कर दिया गया था। स्तालिनके चित्रोको हटाने और उसके प्रति श्रद्धा-भक्ति मिटानेका यत्न कर रहे हैं। वस्तुतः यह तो मार्क्सवादी व्यवस्थाका ही दोष है। जहाँ ईश्वर और धर्मका सम्मान नहीं होगा, लोगोको लिखने, बोलनेकी आजादी न होगी, वहाँ भीषण डिक्टेटरशिपका होना अनिवार्य है। स्वयं बुल्गानिन तथा खुश्चेव भी डिक्टेटर ही हैं। बेरियाको गोली मारकर मालेनकोवको पार्टी एव शासनसमितिके प्रधान पदसे हटाकर मोलोटोवको दबाकर अपने अधिकारोको दृढ रखना ही उनका लक्ष्य था। इसके लिये अभी भीषण उलट-फेर एव हत्याओकी आवश्यकता पड सकती है। जैसे स्तालिनने लेनिनके अनुयायियोको नष्ट किया था, अब उसी प्रकार स्तालिनके साथियोका सफाया करनेका प्रयत्न चल रहा है। अधिकार-प्राप्तिके लिये चलनेवाले इन सघर्षोंका कभी भी अन्त नहीं हो सकता । जर्मनीके हिटलरका नात्सीवाद, इटलीके मुसोलिनीका फासिस्टवाद, रूसी समाजवादियोका डिक्टेटरवाद सब एक-ही-जैसा है। भारतमें भी समाजवादी ढगकी समाज-रचनाका प्रयत्न चल रहा है, जिसका अन्तिम रूप यही डिक्टेटरशिप होनेवाला है। व्यक्तियोकी भूमि, सम्पत्ति, उद्योग छीनकर उन्हें विरोधी शक्तिरहित बनानेका भीषण षड्यन्त्र चल रहा है। अध्यादेशी आर्डिनेन्सो-