भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 657, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 657

३४४ मार्क्सवाद और रामराज्य द्वारा जीवन-बीमा-कम्पनी-जैसी एक-एक वस्तुका सरकारीकरण हो रहा है । एक संसद्-सदस्यने बताया कि यदि अधिवेशनोंके दिन निकाल दिये जायें तो प्रतिदिन एक अध्यादेशका औसत पड़ता है । इस तरह भारतका वर्तमान काँग्रेसी शासन भी डिक्टेटरशिपकी ओर ही बढ़ रहा है । विरोधियोंके दमन करनेकी नीतिमे यहाँ भी तेजी आ रही है । भारतमे उस मार्क्सवादका विस्तार होने जा रहा है जिसमे आत्मा- परमात्माका खण्डन किया जाता है । शून्यवादी तो जड़-चेतन सभीका खण्डन करके शून्यताका ही प्रतिपादन करते थे । आस्तिकोने उनका खण्डन कर आत्मा और परमात्माका अस्तित्व प्रतिपादित किया । आज भी दृढ अध्यवसायके साथ विचार करनेसे मार्क्सवादकी निस्सारता स्पष्ट हो जाती है । अर्थपरायण प्राणी अर्थको ही सबका मूल समझता है । जहाँ धार्मिक, आस्तिक लोग धर्मको ही सम्पूर्ण जगत्की प्रतिष्ठा कहते हैं, वहाँ चार्वाकोंका अनुसरण करते हुए मार्क्सवादी अर्थको ही सम्पूर्ण जगत्की प्रतिष्ठा कहते हैं । 'धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा' के मुकाबिलेमे 'अर्थो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा' कहते हैं । अर्थका माहात्म्य महाभारतादि ग्रन्थोंमें पर्याप्तरूपोमे वर्णित है । तथापि आस्तिकजन अर्थका भी मूल धर्मको ही मानते हैं । इसी अभिप्रायसे कहा गया है '—धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते ।' धर्मसे ही अर्थ एव कामकी भी प्राप्ति होती है । देखते ही हैं बड़े- बडे अर्थशास्त्री हजारो प्रकारके प्रयत्न करते हुए भी भाग्यहीन होनेसे दरिद्र ही बने रहते है । स्वयं मार्क्स ही इसका उदाहरण है । मार्क्स जितना अर्थ- शास्त्रका विचार कर सका उतना अर्थार्जन नही कर पाया । जैसे निपुण चिकित्सकके लिये रोगी रहना एक विडम्बना ही है, वैसे ही एक अर्थनिष्णातका अर्थविहीन दशामे पडे रहना भी विडम्बना ही है । अतः धर्ममूलक ही अर्थ काम भी होते है । श्रम और मुनाफा कहा जाता है कि 'पूँजीपतिके हाथमे पूँजी होनेके कारण पैदावारके साधन उसके हाथमें चले जाते हैं। पूँजीसे पूँजी ही पैदा होती है । यह पूँजी भी शोषणसे इकट्ठी होती है। बड़े परिमाणमे मुनाफेके लिये पैदावार आरम्भ होनेसे पहले मामूलीरूपसे व्यापार चलता है, उपयोगकी वस्तुओको सस्ते दामसे खरीदकर अधिक दाममे बेचकर मुनाफा कमाया जाता है, उन्ही व्यापारोसे पूँजी एकत्रित होती है । सस्ता खरीदकर मँहगा बेचनेका अर्थ होता है या तो सौदेका दाम उचित नहीं दिया गया या उचित मूल्यसे अधिक मूल्य लिया गया । इस तरह मुनाफेकी अधिक गुञ्जाइश नही रहती, परंतु परिश्रम करनेकी शक्ति ही ऐसी वस्तु है जिसके