भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 658, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 658

मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३४५

खरीदनेके बाद और बेचनेमे पहले वह बढ़ जाती है अथवा अधिक उपयोगी पदार्थ पैदा करती है । 'बाजारमे बिकनेवाली हर वस्तुका दाम होता है और वह उस वस्तुकी तैयारीमे खर्च किये गये परिश्रमके समयसे निश्चित होता है। इसी आधारपर बाजारमे बिकनेवाली मजदूरी या परिश्रम-शक्तिका भी दाम निश्चित होता है । मजदूरको उस श्रमशक्तिको प्राप्त करनेके लिये अन्न, वस्त्र, सौदा—खरीदना पडता है, जिसके बिना परिश्रम सम्भव नहीं होता । यद्यपि मजदूर अपने जीवनके लिये अधिक भी खर्च कर सकता है, परन्तु उसे अधिक खर्च करनेको मिलता ही नहीं । मालिक लोग कम-से-कम दाममें उसे खरीदनेका प्रयत्न करते हैं । इस तरह मालिक लोग मजदूरको कम देकर उससे ज्यादा-से-ज्यादा काम लेते हैं । मजदूरद्वारा खर्च किये गये सौदे और मजदूरद्वारा पैदा किये गये सौदेके दाममे जो अन्तर है, वही पूँजीपतिका मुनाफा बन जाता है ।' शक्ति एव उसके परिणाममे भेद है । मजदूरकी जीवनरक्षाके लिये कम- से कम जरूरी सौदेका दाम ही परिश्रम-शक्तिका दाम होता है। मालिक जितने दिनतक मजदूरकी परिश्रम-शक्तिको अपने काममे लाना चाहता है, उतने दिन- तक जीवित रखनेके लिये सौदेका मूल्य देनेके लिये विवश है । वह कहीं एक रुपया रोज, कहीं पाँच रुपया रोज मजदूरी पाता है। वही परिश्रमशक्तिका मूल्य है । वेतनमे दिया 'हुआ धन ही दत्त समझा जाता है। दबाव या बलात्कारसे बाध्य होकर देनेपर भी वह अदत्त ही समझा जाता है। उसे न्यायालयद्वारा लौटाया जा सकता है— भृतिस्तुष्ट्या पण्यमूलं स्त्रीशुल्कमुपकारिणे । श्रद्धाऽनुग्रहसम्प्रीत्या दत्तमष्टविधं स्मृतम् ॥ ( या० स्मृ० २ । १७६ की वीरमित्रोदय टीकामें उद्धृत बृहस्पतिका वचन ) दत्तधन आठ प्रकारका होता है, भृति अर्थात् वेतनके रूपमे मिला हुआ, तुष्टिमे मिला हुआ, सौदेके दामरूपसे मिला हुआ, स्त्रीशुल्करूपमे दिया हुआ, उपकारीको दिया हुआ, श्रद्धासे दिया हुआ, अनुग्रहसे दिया हुआ और प्रसन्नतासे दिया हुआ । इन्हे लौटाया नही जा सकता । कही-कही सात प्रकारके दान अप्रत्यावर्तनीय कहे गये हैं और सोलह प्रकारके दान प्रत्यावर्तनीय— दत्तं सप्तविधं प्रोक्तमदत्त षोडशात्मकम् । पण्यमूल्यं भृतिस्तुष्ट्या स्नेहाद्धर्म्युपकारितम् । स्त्रीशुल्कानुग्रहार्थं च दत्त दानविदो विदुः ॥ अदत्त तु भयक्रोधशोकवेगरुजान्वितै । तथोत्कोचपरीहासव्यत्यासच्छलयोगतः ॥ बालमूढास्वतन्त्रार्तमत्तोन्मत्तापवर्जितम् । कर्ता ममायं कर्मेति प्रतिलाभेच्छया च यत् ॥ अपात्रे पात्रमित्युक्ते कार्ये चाधर्मसंहिते । यद्दत्तं स्यादविज्ञानाददत्तं तत् प्रकीर्तितम् ॥ ( नारदस्मृति ४ । ३, ७—१० )