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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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३३८ मार्क्सवाद और रामराज्य बनानेका प्रयत्न किया जाता है। जिस गायसे दूध लिया जाता है, उसको इस लायक रखा जाता है कि वह कल भी सहायता देने योग्य रहे। यह नहीं कि एक दिन दूध लेकर उसे सदाके लिये मिटा दिया जाय। वस्तुस्थिति तो यह है कि आधुनिक मार्क्सवादियोने यह स्थिति उत्पन्न कर दी है कि छीनाझपटी करनेवाले लोगोकी बहुतायत हो गयी है। वे कहते हैं कि लेगे, मरकर लेगे, मारकर लेगे, जहन्नुममें जाकर, जहन्नुममे भेजकर लेगे, लूटकर-मारकर हर तरहसे लेगे, लेंगे, किन्तु फलस्वरूप देनेवाले कहते हैं कि मर जायेंगे, मिट जायेंगे, परंतु नहीं देगे, नही देगे। ठीक इसके विपरीत रामराज्यकी स्थिति यह है कि देनेवाला हर तरहसे देनेकी चेष्टा करता है। शास्त्र कहते हैं कि श्रद्धासे, प्रेमसे, लज्जासे, भयसे, हर तरहसे देना चाहिये। लेनेवालेको हर तरहसे बचना चाहिये। मुफ्तखोरीका माल हराम- खोरीका माल है। उससे वंशवृद्धि, समृद्धि तथा बरकत रुक जाती है। इस दृष्टिसे देनेवाला हर तरहसे देना चाहता है और लेनेवाला हर तरहसे बचना चाहता है। मार्क्सवादमें 'दो दो', 'नहीं नहीं' का उद्घोष होता है। रामराज्यमें 'लो लो' 'नहीं नहीं' का उद्घोष होता है। मार्क्सवादमे सब वस्तुएँ सरकारी हो जाती है, व्यक्तिकी कोई मिलकियत नहीं रहती है; किंतु रामराज्यमे व्यक्तियोकी बपौती सम्पत्ति सुरक्षित रहती है, और उसपर उचित धर्मनियन्त्रण रहता है। इस पक्षमें धन, धर्म या जान-मालकी रक्षा जो कि राज्य-स्थापनाका प्रमुख उद्देश्य है, सुरक्षित रहती है। मार्क्स को छोड़कर प्राच्य, प्रतीच्य सभी राजनीतिज्ञोने धर्म एव धनकी रक्षा या जान-मालकी रक्षा ही सभ्य व्यवस्थाका उद्देश्य माना है। इसीलिये व्यक्तियोने अपने अधिकार शासनको सौंपा था, जिसके पूरा न होनेपर राज्य-सत्ताको उलट देना जनताका जन्मसिद्ध अधिकार माना जाता है। मार्क्स- वादी व्यवस्थामें धर्म, धन एवं जान-मालका प्रत्यक्ष अपहरण होता है। वैध संपत्ति, बपौती आदिका कुछ भी महत्त्व मार्क्सके मतमें नहीं है। अतिरिक्त मूल्य और शोषण कहा जाता है कि 'कला-कौशल, उद्योग-धंधोके विकासके पहले जब दास- प्रथा थी, तब दासोका भी शोषण अतिरिक्त श्रमके रूपमें होता था। दास एवं गुलामको केवल अन्न और वस्त्र दिया जाता था। वह भी उतना ही जितना कि उसके शरीरमें परिश्रम करनेकी शक्ति कायम रखनेके लिये पर्याप्त था। दासद्वारा कराये गये परिश्रमके सम्पूर्ण फलको मालिक लोग भोगते थे। यही बात सामन्तशाही एव जागीरदारीके जमानेमें थी। सामन्तों एवं जागीरदारोंकी प्रजा कठिन परिश्रमसे जो पैदावार आदि उपज भूमि या भूमिकी पैदावारसे सम्बन्ध रखनेवाले दूसरे कामोसे करती थी, उसमेंसे इन लोगोके शरीरमें परिश्रम-शक्ति बनाये रखनेके लिये अत्यन्त आवश्यक भागको छोड़कर शेष भाग दाम, कर,

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