भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३८७ मार्क्सके अनुसार 'श्रमिक-वर्ग पूँजीवादकी कब्र खोदने हैं । पूँजीपति उसे कम-से-कम वेतन देता है । वेतन-वृद्धिके लिये श्रमिक संघटन करता है, तोड-फोडका मार्ग अपनाता है । राष्ट्रका धन थोड़ेसे पूँजीपतियोंके पास इकट्ठा हो जाता है । अधिकाधिक लोगोंमें दरिद्रता फैल जाती है। श्रमिक धीरे-धीरे सङ्गठित होते हैं। वे कारखाना-सङ्घ, जिला-सङ्घ, राज्य-सङ्घ, विश्वसंघ आदि बनाते हैं और उन्हें यह समझाया जाता है कि पूँजीवादी व्यवस्थामें उनकी दशा कभी भी सन्तोषजनक न होगी । पूँजीवादका अर्थ है, साम्राज्य- वृद्धि, शोषण, युद्ध, महायुद्ध, गरीबी, हत्या आदि । आधुनिक राज्य पूँजीपति- का राज्य है । जब कभी हड़ताल होती है, मजदूर मारे जाते हैं, जेल भेजे जाते हैं। पूँजीपतियोंके पक्षमें ही न्यायालयोंके निर्णय होते हैं। इस आधारपर श्रमिक समझने लगता है कि पूँजीवादी राज्यका अन्त होना ही उसकी सुख-समृद्धि- का कारण है ओर वह महायुद्ध अथवा संकटके समय क्रान्ति करके राज्यको उलट देनेका प्रयत्न करता है । इसी आधारपर (१९१४–१९१८) के महायुद्धमें लेनिनने श्रमिकोंको उकसाकर रूसमें गृह-युद्ध शुरू करा दिया । मजदूर ही पलटनमें भरती होकर सैनिक बनकर युद्ध-कला सीखता है । उस युद्ध-शिक्षाका प्रयोग वह क्रान्तिमें करता है । मार्क्सके मतानुसार श्रमिक-वर्ग ही पूँजीवादका विरोध कर सकता है। वही समझता है कि हमारे पास न धन है न जमीन, केवल श्रमके बलपर ही हमें जीना है । अन्य किसान आदिका पूँजीवादसे कुछ-न-कुछ स्वार्थ रहता है। वे पूँजीवादका विनाश नहीं, किंतु सुधार चाहते हैं । अतः क्रान्तिका नेतृत्व मजदूरके ही हाथमें होना उचित है। पूँजीवाद- के नाशसे मजदूर केवल एक चीज ही खोता है और वह है-गुलामी । हाँ, श्रमिक- वर्ग परिस्थितियोंके अनुसार अन्य वर्गकी भी सहानुभूति प्राप्त करता है।' संक्षेपमें कहा जा सकता है कि सद्भावना एवं मनुष्यताको दूर फेंककर क्षुद्ररूपसे ईर्ष्या, द्वेष एवं लोलुपताको उत्तेजित कर कुछ मुट्ठीभर कूटनीतिज्ञ सर्वहारा राज्यके नामपर तानाशाही राज्य-स्थापनाका प्रयत्न करते हैं । इसीलिये वे सुधार और समझौतेको क्रान्तिमें बाधक समझते हैं । मालिकोंके पैसेसे पेट भरना, मालिकोंके कारण ही एकत्रित होना, उन्हींके प्रसादसे युद्ध-कला सीखना और उन्हींका संहार करना, जब कि ईमानदार शत्रु भी दगा नहीं कर सकता, ऐसे ऐन मौकेपर विश्वासघात करना ही उन्हें सिखाया जाता है। इस मतको 'सिद्धान्त' या 'दर्शन' कहना सिद्धान्त या दर्शनके स्तरको बहुत नीचे गिराना है। दगाबाजी, विश्वास- घातके आधारपर किसी भी समाज या राष्ट्रका कभी भी कल्याण नहीं हो सकता । जिन रूस, चीन आदिमें दगाबाजी—विश्वासघातसे समृद्धि दिखायी देती है, वह भी स्थायी नहीं हो सकती । यों तो मनुका भी कहना है कि अधर्मसे पहले प्राणीकी