भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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३८८ मार्क्सवाद और रामराज्य समृद्धि, विजय एवं कल्याण होता हुआ-सा मालूम पड़ता है, परंतु अन्तमें उसका नाश ध्रुव है— अधर्मैणैधते तावत्ततो भद्राणि पश्यति । ततः सपत्नान् जयति समूलस्तु विनश्यति ॥ ( मनु० ४ । १७४ ) इनका कूटनीतिक सिद्धान्त भी स्थिर नही । मार्क्सने बतलाया था कि ‘क्रान्तिका नेतृत्व श्रमिकोंके ही हाथमें हो सकता है, अन्य वर्गका अधिनायकत्व नही हो सकता । इसपर विविध तर्कोंके द्वारा बल दिया गया, परंतु मार्क्सवादी चीनने ही किसानोके द्वारा क्रान्ति करके पिछले मतको मिथ्या सिद्ध कर दिया । मार्क्सवादी इसे कुछ विशेष परिस्थितियोंके कारण अस्थायी परिवर्तन बतलाते हैं। चीनकी कम्युनिस्टपार्टीने किसानोकी सहायतासे ही क्योमिताङ्ग ( चीनकी राष्ट्रिय संस्था ) को पराजित कर नयी राज्य-व्यवस्था कायम की । चीनकी क्रान्ति किसानोद्वारा हुई, मजदूरोद्वारा नहीं, यह पुराने मार्क्सवादके विरुद्ध है । अब आधुनिक मार्क्सवादी ग्रन्थोमे मजदूरोके स्थानमे ‘किसान-मजदूर’ कहा जाने लगा । माओत्सेतुंग चीनकी क्रान्तिको समाजवादी क्रान्ति नही मानते, किंतु पूँजीवादी जनतन्त्रीय क्रान्ति बुर्जुवा डेमोक्रेटिक रीवोल्यूशन कहते हैं । इसके द्वारा सामन्तशाहीका अन्त किया गया है, पूँजीवादका नहीं । मार्क्सने कम्युनिस्टपार्टीके नेतृत्वमें सर्वहाराकी क्रान्ति कहा था । लेनिनने कहा था कि ‘पिछड़े हुए सामन्तवादी अथवा पूँजीवादी देशमें ( जैसा चीन या जारशाही रूसमें था ) पूँजीवादी जनतन्त्रीय क्रान्ति शीघ्र ही समाजवादी क्रान्तिके रूपमें परिणत की जा सकती है।' परंतु चीनमें ऐसा नही हुआ । माओत्सेतुगके मतानुसार ‘चीनकी पूँजीवादी जनतन्त्रीय क्रान्ति पुरानी क्रान्तियोसे भिन्न है।’ कहा जाता है ‘रूसी क्रान्तिके प्रथम फ्रांस आदिकी क्रान्तियोका नेतृत्व पूँजीवादियोके हाथमें था । श्रमिकवर्गका उसमे , सहयोग था । क्रान्तियोके बाद समाजपर पूँजीवादियोका ही एकाधिपत्य हुआ । श्रमिकोंकी हीन दशा ज्यो-की- त्यो बनी रही, परंतु रूसी क्रान्तिके पश्चात् श्रमिकवर्ग सतर्क हो गया । अतः अब फ्रांस-जैसी पूँजीवादी जनतन्त्रीय क्रान्ति ( १७८७ ) जिसमे श्रमिकोका कोई स्थान न रहे, सम्भव नही । चीनकी क्रान्ति कम्युनिस्टपार्टीके नेतृत्वमे हुई थी, इसलिये चीनके पूँजीपति अपना एकाधिकार स्थापित नहीं कर सके । पूँजीवादको रखते हुए माओका कहना है कि किसान-मजदूरोके हित पूर्णतया सुरक्षित रहेगे।’ इस तरह यह नहीं कहा जा सकता कि ‘मार्क्सने जो कह दिया, वह ब्रह्माक्षर हो गया, गलत नहीं होगा। मार्क्सवादी भी इसे मार्क्सवादकी पुनर्व्याख्या मानते हुए साम्यवादको पुराने मार्क्सवादसे भिन्न मानते हैं । इससे पुनरुत्थान नहीं हो सकता, पूँजीवादमें सुधार नही हो सकता', यह पक्ष खण्डित हो जाता