मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै । पूँजीवादके रहते हुए भी किसान-मजदूरोंका हित सुरक्षित रह सकता है— यह चीनी क्रान्तिसे स्पष्ट ही है । मार्क्सका कहना था कि ‘पिछली क्रान्तियाँ एक शोषक-वर्गके नेतृत्वमें दूसरे शोषकवर्गको पदच्युत करनेके लिये हुई थीं । फ्रांसकी ऐतिहासिक राज्यक्रान्ति पूँजीपतियोंने सामन्तशाहीके विरुद्ध की थी । ब्रिटेनके गृहयुद्ध ( १६४२-४९ ) और रक्तहीन क्रान्ति ( १६८८ ) का भी यही सार है । इन क्रान्तियोंसे शोषणका अन्त नहीं हुआ, किंतु सर्वहारा-क्रान्तिद्वारा वर्गों तथा शोषणका अन्त होगा । शोषणके अन्तके लिये ही श्रमिकोकी क्रान्ति होती है ।’ शोषणकी मनोवृत्ति बदलनेसे ही शोषणका अन्त होता है । ईमानदार शासकोके शासनका उद्देश्य ही शोषण या मात्स्यन्यायका अन्त करना राज्य-संस्था- की स्थापनाका उद्देश्य ही यही है। बिना ईमानदारीके श्रमिक-क्रान्तिसे भी शोषण- का अन्त नहीं होता । अपने विरोधियोको कुचल डालनेकी तीव्र भावना कम्युनिस्टो- में सर्वाधिक होती है । पूँजीवादियोमें परस्पर जैसे सङ्घर्ष होता है, वैसे ही किसानो तथा मजदूरोके भी परस्पर सङ्घर्ष आये दिन होते ही रहते हैं, जिसमें एक दूसरेके शोषणके लिये वे प्रयत्नशील रहते हैं। मार्क्सने यह भी कहा था कि ‘समाज तभी बदलता है जब उसका अन्त- र्विरोध चरम सीमापर पहुँच जाता है, प्रगति असम्भव हो जाती है, पूँजीवादी उत्पादनकी वृद्धिसे बाजारोंकी खोज होती है। जहाँतक बाजार मिलते रहते हैं, प्रगति होती रहती है । परन्तु जैसे ही नये बाजारोंका अभाव होता है, फिर पूँजीवादकी प्रगति समाप्त हो जाती है । पूँजीवाद एव उसके भीषण संकटका अन्त क्रान्तिसे होगा । पुराने समाजके अन्त एव नये समाजके जन्मके लिये क्रान्ति नितान्त आवश्यक है ।’ रामराज्यकी दृष्टिसे सदिच्छा, सद्बुद्धि तथा सद्धर्मकी भावना फैलाकर एक वर्गको दूसरे वर्गका पोषक बनाया जा सकता है । चीनी कम्युनिस्ट पूँजीवादको रखते हुए भी उन्नति सम्भव समझते ही हैं । मार्क्सने भी ब्रिटेन और अमेरिका- जैसे जनवादी देशोंमें क्रान्ति बिना भी संसदीय नीतिसे सामाजिक परिवर्तन सम्भव माना है । रामराज्यकी निर्दिष्ट प्रणालीके अनुसार क्रान्ति एव सामाजिक परिवर्तन बिना भी गतिरोध दूर हो जाता है ।
सामाजिक संकट
जो कहा जाता है कि ‘सम्पूर्ण उत्पादन-साधनो या मुनाफा कमानेके साधनो- का समाजीकरण हो जानेसे कोई वस्तु मुनाफाके लिये कमायी ही न जायगी, उपयोगके लिये आवश्यकताके अनुसार ही सब वस्तुओका उत्पादन होगा, अतएव