मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 709, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ें३९६ मार्क्सवाद और रामराज्य आश्रय लेना ही पड़ेगा । सब लोग जितना कमाये उतना खा-उड़ा जायँ तो उपर्युक्त काम कैसे चलेगा ? एक व्यक्तिकी स्वतन्त्रताकी सीमा वहींतक है, जहाँतक कि दूसरोकी स्वतन्त्रतामे बाधा न पड़े । यह सभी सभ्य शासन मानते हैं, यह मार्क्सकी कोई नयी बात नहीं है । परंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि परस्परका सेव्य- सेवकभाव या उपकार्य-उपकारकभाव समाप्त हो जाय । सभी सैनिक यदि निजी स्वतन्त्रताकी बराबरीका दावा करे तो सेनापतिकी आज्ञा ठुकरा सकते हैं, फिर तो सैनिक-संगठनका उद्देश्य ही समाप्त हो जाय । समाजवादी किसी अन्यके चक्रवर्तित्वकी तो समालोचना करते हैं, परंतु मजदूर तानाशाही सम्पूर्ण विश्वपर कायम करनेके लिये आकाश-पातालका कुलाबा भिड़ा रहे हैं । आखिर सोवियतसंघके सभी राष्ट्र मास्कोके कुछ तानाशाहोंके इच्छानुसार ही चल रहे हैं, विश्व कम्युनिष्ट- संघ आखिर सम्पूर्ण संसारमे कम्युनिष्ट शासन-स्थापनका प्रयत्न करता ही है। फिर राम-जैसे जितेन्द्रिय, सदाचारी, धर्म-नियन्त्रित, चक्रवर्तीके निष्पक्ष शासनमे सम्पूर्ण विश्वमे शान्ति हो, छीना-झपटी बंद हो, सब सुखी हो तो क्या आश्चर्य है ? अपने विश्वासके अनुसार सब अपना धर्म पालन करें, अपनी शक्ति एवं बुद्धिके अनुसार अर्थोपार्जन करे, अपनी कमाई अपने इच्छानुसार अपनी संतानोंको दे सकें, दान-पुण्य कर सकें, लोक-परलोक बना सकें, कोई किसीके धर्म एवं सम्पत्तिपर हमला न करे, सभी उन्नत सभी सुखी हो—यही तो रामराज्य है । मार्क्सवादी कहते हैं कि 'दिखायी पड़नेवाली व्यक्तियोंमे सम्पत्ति एव योग्यताकी असमानता मौजूद है । अध्यात्मवादी इस असमानताका दूर होना असम्भव मानते हैं, परंतु मार्क्सवादी इस असमानताको दूर कर सकनेका दावा करते हैं । असमानता दूर होनेकी ही अवस्थाका नाम कम्युनिज्म या समष्टि- वाद है। इसमे यथासम्भव समानता दूर कर देनेके बाद संघटनका सिद्धान्त होगा, प्रत्येक मनुष्य अपनी सामर्थ्यभर परिश्रम करेंगे और प्रत्येक मनुष्यको अपनी आवश्यकताके अनुसार पदार्थ मिलेगा । एतदर्थ योग्यता एवं शिक्षाकी असमानता दूर होनी आवश्यक है।' मार्क्सवादी जन्मान्तरीय कर्मोंकी विचित्रतासे असमानता नहीं मानते । वे परिस्थियोंको ही इसका मुख्य कारण मानते हैं । सबको शिक्षा, मस्तिष्क एवं स्वास्थ्यकी उन्नतिका समान अवसर देकर दिखायी देनेवाली असमानता दूर की जा सकती है । जन्मसे ही अल्पबुद्धि एव दुर्बल, गरीबोकी ही संतान होती है । अमीरोंकी संताने अधिक स्वस्थ एव बुद्धिमान् होती हैं। मार्क्सवादके अनुसार सबको समान अवसर मिलनेसे नयी पीढीके लोगोंमें असमानता बहुत कुछ कम हो जायगी । कुछ पीढींतक समान परिस्थियोंमे मनुष्यका जन्म होनेसे प्रायः सब एक-से ही बलवान्, बुद्धिमान् होगे । यदि पशुकी नस्लमे उन्नति की जा सकती है तो मनुष्यका सुधार क्यो नही होगा ? भले ही कुछ लूले-लँगड़े, अन्धे भी हों फिर भी नियम तो जन-साधारणकी दृष्टिसे ही बनते है ।'