भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ३९७ वस्तुतः यह तर्क बहुत ही निःसार है। 'अमीरोंके लड़के बुद्धिमान्, बलवान् होते हैं', यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि प्रायः देखा जाता है कि अमीरोंके लड़के अधिक निर्बुद्धि एवं निर्बल होते हैं। व्यवहारमें धनवानोंको ही लक्ष्मीका वाहन अर्थात् उल्लू कहा जाता है। अधिकांश धनवान् विलासी होते हैं। निर्वीर्य होनेसे पहले तो उन्हें संतान ही कम होती है, जिससे इनमें दत्तकोंकी भरमार चलती है। संताने उत्पन्न भी होती हैं तो निर्बल एवं निर्बुद्धि। हम पहले कह चुके हैं कि व्यापारकी दक्षता, शोषणके हथकंडे, जाल-फरेबकी सब बातें, राजाओं, जमींदारोंके दीवान या कारिन्दे तथा सेठोंके मैनेजर-गुमास्ता लोग ही करते थे या करते हैं। आज भी ऐसे-ऐसे धनवान् हैं कि केवल धनके कारण ही उनका सम्मान किया जाता है। यदि उनको धन न होता तो कौड़ी-कीमतका भी उन्हें कोई न पूछता। हाँ, जहाँ सावधानीसे प्रयत्न किया जाता है, वहाँ धनवान्, बलवान्, बुद्धिमान् एवं धर्मनिष्ठ भी होते हैं। शास्त्रोंमें इसे पूर्वजन्मकी तपस्याओ एव योगाभ्यासका फल बताया है—'शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते।' (गीता ६।४१) योगभ्रष्ट अर्थात् योगकी पूर्ण सिद्धि-मुक्ति पानेके पहले मरनेवाले लोगोंका पवित्र श्रीमानोंके घरमें जन्म होता है। हरिश्चन्द्र, दिलीप, मान्धाता, अज, दशरथ, युधिष्ठिर, अर्जुन आदि इसके उदाहरण हैं। प्रायः लक्ष्मी-सरस्वतीका विरोध ही समझा जाता है। किसी ही पुण्यशालीके यहाँ लक्ष्मी-सरस्वतीका सहवास होता है, परंतु इससे भी उच्च पक्ष महातपस्या, महासौभाग्यसे अरण्यवासी विरक्तों, निष्किञ्चनों, उञ्छशिल- वृत्तिवालेके यहाँ जन्म होना माना गया है, क्योकि वहाँ बुद्धि-विवेककी बहुत ही प्रधानता रहती है— अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।••• तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्॥ (गीता ६।४२, ४३) भारतके जितने भी विशिष्ट विद्याएँ, ज्ञान, विज्ञान, दर्शन, शिल्प, साहित्य तथा नीति आदि सम्बन्धी ग्रन्थ हैं, सबके रचयिता अरण्यवासी कन्द-मूल-फलाशी वल्कलवसनधारी निष्किञ्चन लोग ही हुए हैं। वेदान्त, सांख्य, न्याय, मीमांसा, वैशेषिक, योग, भारत, रामायण, योगवाशिष्ठ तथा शुक्र, बृहस्पति, कणिक, कौटिल्य, कामन्दक आदि नीतिग्रन्थ हैं, सबके निर्माता अकिंचन लोग ही हैं, धनवान् या पूँजीपति नहीं। शंकराचार्य, उदयनाचार्य, भट्टपाद, श्रीहर्ष, वाचस्पति मिश्र, रामानुजाचार्य, तुलसीदास, सूरदास आदि कोई भी धनवान् आदमी नहीं थे। आजके भी विभिन्न देशोंके विभिन्न नेता उन्हीं वर्गोंमें हैं तथा यहाँतक कि मार्क्स भी अमीर नहीं था। सभी अकिंचन सरस्वतीके उपासक विद्वान् ही मान्य हैं। लक्ष्मीके उपासक सदा ही उनका अनुगमन करते थे। मान्धाता, हरिश्चन्द्र, रामचन्द्र आदि भी वसिष्ठ आदि ऋषियोंके ही नियन्त्रणमें रहते थे।