भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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३९८ मार्क्सवाद और रामराज्य अतएव यहाँ उच्च शास्त्र-ज्ञानवाला निर्धन ब्राह्मण ही सर्वोत्कृष्ट माना गया है। फिर यह भी तो देखते हैं कि एक ही अमीरके चार पुत्रोंको समान अवसर मिलनेपर भी कोई बहुत चतुर निकलता है, कोई भोदू निकलता है। जगत्की विचित्रताका आधार कर्मको मानना ही पड़ेगा। जहाँ इस जन्मके कर्म वैचित्र्यसे उपपत्ति न हो वहाँ जन्मान्तर-कर्मको वैचित्र्य मानना अनिवार्य है। उष्ट्र, गर्दभ, मनुष्यादिके वैचित्र्यका भी क्या कारण है ? इस प्रश्नका जन्मान्तरीय कर्मके सिवा अन्य कोई समाधान नहीं है। जो इन विचित्रताओंका कारण स्वभावको कहते हैं उनसे प्रश्न होगा, स्वभाव क्या है ?—सत् या असत् ? असत् कहे तो उसमे कार्य- क्षमता नहीं हो सकती, सत् है तो भी वह चेतन है या अचेतन ? अचेतनमे भी विवेकाभावात् विचित्र कार्यकरत्व नहीं हो सकता। चेतन कहे तो भी अल्पज्ञ या सर्वज्ञ ? अल्पज्ञमें भी विविध वैचित्र्योपेत विश्वका व्यवस्थापकत्व नहीं बन सकता। सर्वज्ञ कहे तो प्रश्न होगा कि वह सापेक्ष विचित्र सृष्टि करता है या निरपेक्ष ? निरपेक्ष कहे तो उसमे वैषम्य, नैर्घृण्य दोष आयेगा । सापेक्ष कहे तो वही कर्म-सापेक्षता माननी पडेगी। सदा ही अध्यापको, इजीनियरों, डाक्टरो, जजों, प्रधानमन्त्रियोंके स्थान थोडे ही रहेगे। मजदूरो, छात्रो, न्यायार्थियो तथा गरीवलोगोकी सख्या ही अधिक रहेगी। अतः चींटींको कनभर और हाथीको मनभरका सिद्धान्त बिना माने काम चलना सर्वथा ही असम्भव होगा। फिर भी समता या विषमता असंतुलित न रहनी आवश्यक है। अति विषमता, अति समता दोनो ही अव्यवहार्य हैं। जैसे अङ्गमे भी सब बराबर नही होते, हाथकी अगुलियाँ भी सब एक-सी नही होती हैं। फिर भी उनकी समता-विषमता संतुलित रहती है। यही स्थिति समाजकी भी उचित है। यदि कम्युनिष्ट काल्पनिक समताके आधारपर सिद्धान्त बनाना चाहते हैं तो अध्यात्मवादीके यहाँ आत्मा ही वास्तविक समानता स्वतन्त्रता भ्रातृत्ताकी आधारभित्ति है। इतना ही नहीं, अध्यात्मवादी ही ऐसी भी अवस्थाका आना अनिवार्य मानते हैं, जब सभी परमानन्द ब्रह्मस्वरूप ही होगे, विषमताकी गन्ध भी कही उपलब्ध नहीं होगी। परंतु व्यवस्था तो करनी है वर्तमान स्थितिकी, अतः हम कल्पनाओको छोड़कर उपस्थित अवस्थामे क्या हो सकता है, यही विचार करना उचित समझते हैं। वैधानिक साधनों एव धार्मिक, आध्यात्मिक साधनोसे समष्टि जगत्को उच्च-से-उच्च स्तरपर पहुँचाना रामराज्यका आदर्श है। 'रामभगति रत सब नर नारी। सकल परम गति के अधिकारी॥' 'हृष्टः पुष्टः प्रमुदितः 'नाकुण्डली नास्रग्वी १' इत्यादि श्लोकोमे कहा गया है कि 'रामराज्यमें सभी हृष्ट-पुष्ट, प्रमुदित रहते थे। सभीके गृहोमें हीरकादिजटित स्वर्णमय कपाट लगे रहते थे।' फिर भी वास्तविकता यह है कि पदार्थोंकी उत्पत्तिकी कुछ सीमाएँ हैं। यदि सभी स्वतन्त्र हवाईजहाज, सभी हम्बर, रोल्स, व्यूक मोटर चाहे, सब-के-