भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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४०४ मार्क्सवाद और रामराज्य

इस सम्बन्धमे रामराज्यवादीका कहना है कि 'युद्धका खतरा मिटे, विश्व व्यापी संगठन बने, विश्व सरकार बने', यह सब बात अच्छी है, परंतु वह समाजवादकी ही सरकार हो ऐसा आग्रह क्यो ? भौतिकवादी अपना विचार सभी राष्ट्रो एवं सभी व्यक्तियोपर लादना चाहते हैं, परंतु संसारमें आज भी अरबो मनुष्य ईश्वर, धर्म एव अपने वेद, बाइबिल, पुराण, कुरान, अवेस्ता एवं मन्दिर, मसजिद, गिरजा, गुरुद्वारामें विश्वास रखते हैं। अपने शास्त्रोके अनुसार अपने धर्म, कर्म, संस्कृति, सभ्यताका पालन करते हैं। वे अपने पूर्वजोंके ऐतिहासिक गौरव तथा अपनी बपौती, मिल्कियतके स्वामी होनेका विश्वास रखते हैं तथा अपनी कमाई अपने वेटो-पोतोके लिये छोड़ना उचित समझते हैं । फिर सबको तिलाञ्जलि देकर अपनी सभ्यता, संस्कृति, सम्पत्तिसे हाथ धोकर जडवादकी पराधीनता स्वीकार करना किसे अभिमत हो सकता है, जहाँ अपना विचार व्यक्त करने, प्रचार करनेकी भी स्वाधीनता नही है और न प्रेस-पत्र, भूमि, सम्पत्ति आदि सामग्री ही है । वस्तुतः पारिवारिक संगठनमें भी व्यक्ति मिट नहीं जाता, उसे कभी भी पृथक् रहनेकी स्वाधीनता रहती है । इसीलिये वृहस्पतिने भी सम्मिलित कुटुम्ब-प्रथाका पोषण करते हुए भी कहा है कि सम्मिलित कुटुम्बमें पृथक् पृथक् व्यक्ति अग्निहोत्र, बलिवैश्वदेव, श्राद्ध आदि नहीं कर सकता। एक गृहपति—घरका पुरखा ही सब करता है— एकपाकेन वसतां पितृदेवद्विजार्चनम् । एकं भवेद् विभक्तानां तदेव स्याद् गृहे गृहे ॥ ( बृहस्प० स्मृ० गायक० सं० २६।५) अतः पृथक् धर्मानुष्ठानकी दृष्टिसे पृथक् भी रह सकते हैं । एवं सह वसेयुर्वा पृथग् वा धर्मकाम्यया । पृथग् विवर्धते धर्मस्तस्माद् धर्म्या पृथक्क्रिया ॥ ( मनु० ९।१११ ) वस्तुतः वृक्षोंका समुदाय ही वन होता है । ऐसे ही व्यक्तियोका समुदाय ही समाज होता है । वृक्षोके कटनेसे वन कट जाता है, अतः व्यक्तियोके परतन्त्र एवं जडप्राय होनेसे समाजकी भी वही दशा होगी । केवल समाजके नामपर कुछ तानाशाहोंके हाथमें ही विश्वका जीवन डाल देना कौन बुद्धिमान् ठीक समझेगा ? अतः इसकी अपेक्षा रामराज्यकी व्यवस्था कही श्रेष्ठ होगी, जिसमें सभी व्यक्तियो, जातियो, सम्प्रदायो एवं राष्ट्रोंके अपने विश्वासके अनुसार अपना धर्म, ईश्वर एव शास्त्र मानने, विचार व्यक्त करनेकी पूर्ण स्वाधीनता होगी । पुराण, कुरान, वेद, बाइबिल, मन्दिर, मस्जिद, गिरजा, गुरुद्वारा—सबका सम्मान रहेगा । सभी अपने तीर्थों, देवस्थानोका आदर कर सकेंगे । सभीका