भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ४०३ मानता, वह देशका महत्त्व क्या मानने लगा ? जिनका मत है कि 'माता अपने स्वार्थसे दूध पिलाती है; क्योंकि दूध बिना निकले उसे कष्ट होता है । शिशु भी क्षुधासे पीड़ित होकर स्तन पीने लगता है', उन्हे देशभक्तिसे क्या लेना ? पर जलमें मेढक भी होता है, मीन भी होती है । मेढकका जल-स्नेह नगण्य है, परंतु मत्स्य जलका अनुरागी है । जड़वादियोको जहाँ रोटी मिले, वही उनका देश है, परंतु धार्मिक-सांस्कृतिक भावनावाले तो अपने पूर्वजो तथा अपनी जन्मभूमिके प्रदेशको, अपने पावन तीर्थों, अवतारों, देवताओं, महापुरुषोके तपःपूत लीलाभूमिको बड़ी आदरकी दृष्टिसे देखते हैं और उसकी रक्षा तथा सम्मानके लिये उन्हें आत्मबलिदान करनेमें कुछ भी संकोच नहीं होता । गोस्वामी तुलसीदासके राम कहते हैं— जद्यपि सब बैकुंठ बखाना । वेद पुरान विदित जगु जाना ॥ अवध पुरी सम प्रिय नहिं सोऊ । यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ ॥ जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि । उत्तर दिसि बह सरजू पावनि ॥ मार्क्सवाद एवं युद्ध मार्क्सवादी कहते हैं कि 'युद्ध जंगलीपनका चिह्न है । स्वयं कमाकर खानेके बजाय दूसरोंसे छीनकर पेट भरना ही युद्धका स्वरूप है । सामाजिक भावना एवं सहयोगकी बुद्धि होनेसे परिवारके रूपमे संगठित होते ही आपसी लड़ाई बंद हो गयी । एक परिवारके आदमी एक हित समझकर आपसमें न लड़कर दूसरे परिवारसे लड़ने लगे फिर लड़ाईके बजाय परिवारोंमें भी सहयोगकी भावना हुई । फिर गाँवभरका एक हित समझनेकी बुद्धि हुई तो परिवारोंका भी युद्ध बंद होकर गाँवोंका युद्ध होने लगा । मनुष्यकी आवश्यकताओ एवं पैदावार-साधनोंके बढनेसे आत्मीयताका क्षेत्र बढ़ गया और फिर देशका संगठन होने लगा । परंतु अब तो वैज्ञानिक विकासके युगमें कोई भी देश दूसरे देशकी सहायताके बिना अकेले रह नहीं सकता । सभी देशोंके परस्पर सम्बन्ध हैं, अतः उनमे भी सहयोगका सम्बन्ध होना चाहिये । इतिहासके क्रमको देखते हुए अब वह समय आ गया है कि देशो एवं राष्ट्रोंको मिटाकर सम्पूर्ण संसार एक राष्ट्रका रूप धारण कर सके । पूँजीवादी-प्रणालीमें साम्राज्यवादके रूपमे देशोके संगठनका प्रयत्न होता है; परंतु उसके मालिक दूसरे-दूसरे देशों एवं उपनिवेशोंका शोषणकर स्वार्थसिद्धिकी चेष्टा करते हैं । अतः अन्य देशोंके असंतोष एव बगावतकी भावना बनी ही रहती है । अतः समाजवादी प्रणालीके आधारपर ही यह संगठन सम्भव है । इसीलिये अन्ताराष्ट्रिय कम्युनिष्ट-संघकी चेष्टाएँ सभी राष्ट्रोंमे चलती रहती हैं । संसारके प्रत्येक देशको विश्वव्यापी समाज और राष्ट्रका अङ्ग बन जाना चाहिये और उनका परस्पर सहयोग होना चाहिये । इस तरह युद्धोंका भय सदाके लिये दूर हो सकता है । एक देशके किसानों-मजदूरोंमें दूसरे देशके किसानों-मजदूरोंसे कोई द्वेष नहीं रहता, अतः उनका ही राज्य होना ठीक है ।'