मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयन्त्रो, पेट्रोल आदिके लिये रामराज्यमें युद्ध नहीं होंगे । धर्म, संस्कृति तथा गरीबोके हित-स्वत्वोंकी रक्षाके लिये अनिवार्य होनेसे युद्धका स्वागत किया जायगा । ससारमें आर्तनाद न हो, अन्याय-अत्याचार न हो, किसीकी बहू बेटियोंके सम्मानपर आँच न आवे, इसीलिये बलवानोका बल एव अस्त्र-शस्त्र आदि अपेक्षित होते हैं और अपेक्षित होते रहेगे । मार्क्सवादी कहते हैं, 'आज मजदूरोंके लिये देशभक्तिकी बात व्यर्थ है। जब कोई पूँजी देशमें लगती थी, तब कुछ मजदूरोंको लाभकी सम्भावना भी थी । परंतु, जब पूँजीपति अपनी पूँजीको उन विदेशोंमें लगाना पसंद करते हैं, जहाँ मजदूरी कम देनी पडे और कच्चे माल सस्ते पड़े, तब ऐसे पूँजीपतियोंके देशके मजदूर देशभक्तिके नामपर अपनी जान क्यो दें ?' मार्क्सवादीकी दृष्टिमें 'जिसकी कोई सम्पत्ति नहीं, उसका कोई खास देश नहीं होता । केवल दो हाथ ही उसकी अपनी सम्पत्ति है। जहाँ मजदूरी मिल जाय, वही उसका देश है । पूँजीपति भी अपने लाभके लिये लाखो किसानो-मजदूरोंको तोपकी आगमें झुलसा डालते हैं । इनकी जीतोंमें मजदूरोंका कोई लाभ नहीं होता ।' उपर्युक्त बाते किसी देश-कालके लिये सही हो सकती हैं, परंतु यह व्यापक सत्य नहीं है । आस्तिक लोग जननी, जन्मभूमिको स्वर्गसे भी श्रेष्ठ मानते हैं—'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।' उञ्छशिल वृत्तिवाले अकिंचन महर्षि—जिनकी भौतिक सम्पत्ति कुछ नहीं—उन्हें भी मातृभूमिकी भक्ति मान्य होती है । देशधर्मकी रक्षा और कल्याणके लिये वे भी अपने सर्वस्वका त्याग करते ही रहते हैं । भारतीयोंमें तो प्रातःकाल ही धरित्रीपर पाद-विन्यास करनेके पहले धरित्रीकी वन्दना की जाती है, परंतु वे मातृभूमिकी भक्तिके साथ मातृपति परमेश्वरको नहीं भूलते । उनकी मातृभक्ति संकीर्ण एव किसीकी हानि पहुँचानेवाली नहीं होती । इसीलिये वे समुद्रवसना पर्वतस्तनमण्डला धरित्रीको विष्णुपत्नी मानते हैं— समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले । विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे ॥ कहीके भी मजदूर कोई राष्ट्रसे बाहरकी वस्तु नहीं—विशेषतया भारतमें तो उच्च खानदानके ब्राह्मण, क्षत्रियादि ही मजदूर बनकर अपना जीवन बिता रहे हैं। उनको अपने देश, धर्म, जातिका ध्यान रहता है, उसका रक्षण उन्हे अभीष्ट है। पूँजीपतिके लिये नहीं, अपने लिये, अपने धर्मके लिये भी उन्हे देशभक्ति आवश्यक होती है । वस्तुतः इसीलिये धार्मिक तथा सास्कृतिक इतिहासोंके सस्कारोंमे ओतप्रोत भावनाके बिना राष्ट्रीयताका कोई महत्त्व नहीं होता । जो जडवादी विश्वस्रष्टाको ही नहीं मानता; अपने माता-पिताका ही महत्त्व नहीं