भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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इस सम्बन्धमें व्यापक दृष्टिकोणसे विचार करते हैं । अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदिके नियम विश्वव्यापी एवं विश्वके हितार्थ हैं । प्रत्येक व्यक्तिको समाज, राष्ट्र एवं विश्वके हानिकारक किसी काममें नहीं प्रवृत्त होना चाहिये । समष्टिके अविरोधेन ही व्यष्टिकी चेष्टा आदरणीय है । अहिंसा आदि समष्टि सामाजिक समझौतेका आदर सबको करना चाहिये ।

मार्क्सवाद एवं राष्ट्र

परंतु जबतक सभी राष्ट्र एवं समाज इस उच्चकोटिके सिद्धान्तको मान नहीं लेते, तबतक क्या किसी सज्जन व्यक्ति या राष्ट्रको किसी कूटनीतिक व्यक्ति या राष्ट्रकी कूटनीतिका शिकार बन जाना चाहिये ? रामराज्यवादी ऐसे अवसरके लिये अनिवार्यरूपसे आनेवाले युद्धका स्वागत करता है । मायावीके साथ निरी साधुतासे काम नहीं चलता । यस्मिन्यथा वर्तते यो मनुष्यस्तस्मिंस्तथा वर्तितव्यं स धर्मः । मायाचारो मायया बाधितव्य साध्वाचार साधुना प्रत्युपेयः ॥ (महा० शा० प० १०९ । ३० ) समाजमें जब कृतयुगके प्रारम्भमें सत्त्वगुणका पूर्ण प्रभाव था, सभी धर्म नियन्त्रित थे, तब युद्धकी आवश्यकता नहीं थी । परंतु समाज त्रिगुणात्मक है, इसमें रज और तम भी हैं ही । फिर कभी उनका भी उद्भव सम्भव है । जब अत्यन्त तामस, राजस, आदमीपर उपदेशका असर नहीं पड़ता, तब वहाँ दण्डविधान अनिवार्य ही होता है । तभी तो प्रत्येक राष्ट्रमें कानून, दण्डविधान, पुलिस, थाना, जेल आदिकी व्यवस्था है । ये ही व्यष्टिके उपद्रव समष्टिमें भी फैलते हैं । तब बड़े युद्धोका रूप बन जाता है । समाजवादियोंको ही अपने विरोधियोंके दमनार्थ क्या-क्या नहीं करना पड़ता है । कितने गुप्तचर, कितनी पुलिस, पर्ज (सफाया ) में संलग्न है । रामराज्यमें अन्यायी रावणको भी पहले अन्यायसे विरक्त होनेके लिये समझाया-बुझाया गया था । जब अनेक प्रकारसे समझाने-बुझानेपर भी रावण रास्तेपर नहीं आया, तब उसे दण्ड देना अनिवार्य हो गया । यही रामराज्यका युद्ध है । ऐसा युद्ध निरावरण साक्षात् स्वर्गका द्वार है, इससे पराङ्मुखकी अकीर्ति तथा पुण्यलोकोंका नाश ध्रुव है— अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि । ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥ (गीता २ । ३३ ) समष्टि-हितके लिये महायन्त्रका प्रवर्त्तन बन्द होना चाहिये । रामराज्यशासनमें उत्पादनमें मुनाफाको प्राथमिकता न देकर राष्ट्रकी आवश्यकताको प्राथमिकता दी जायगी । सरकारद्वारा निर्धारित राष्ट्रहितानुतूल योजनाका अनुसरण करना सभी उद्योगपतियोंका कर्तव्य होगा । अतः आधुनिक जड़वादियोंके समान बाजारों, मा० रा० २६—