भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 713

४०० मार्क्सवाद और रामराज्य वादी कहते हैं कि गैरसमाजवादी देश व्यापारमें होड़ करते हैं। दूसरे देशोंके बाजारोंपर कब्जा करना चाहते हैं, जिससे सबको युद्धके लिये तैयार रहना पडता है। पूँजीवादी शासन-प्रणाली रहते-रहते यदि कोई देश निःशस्त्र हो जाय तो खूँखार पूँजीवाद देश उसे झपट लेते हैं। युद्धकी तैयारीमे लगे रहनेसे पैदावारमे बाधा पडती ही है। प्रायः सभी देशोंकी आमदनीका बहुत बड़ा भाग शस्त्रास्त्र एव फौजोंपर खर्च हो जाता है। धनके इस भागका फल मिलता है भय, कष्ट एव अकालमृत्यु । यह सब धन मनुष्योंकी हालत सुधारनेमे लगानेसे बहुत लाभ हो सकता है। लाखो बलवान् जवान युद्धकी तैयारीमे फँसे रहते हैं, पैदावारका काम नही कर सकते । इनका सम्पूर्ण समय मरना, मारना, सिखने-सिखानेहीमे खर्च होता है। यदि मुनाफा कमानेकी भावना छोड़कर उपयोगके लिये ही माल तैयार किया जाय तो अन्ताराष्ट्रिय पूँजीवादी होड समाप्त हो जायगी । फिर न दूसरे देशोकी बाजारोकी जरूरत रहेगी और न युद्ध आवश्यक होगा । आधुनिक पूँजीवादी या समाजवादी सभी शासन धर्महीन होनेका ही महत्त्व समझते हैं । इसीलिये व्यक्तिगत स्वार्थकी इतनी प्रधानता हो गयी है कि एक दूसरेकी हत्या उनकी दृष्टिमे साधारण-सी बात होती है । धर्म,नियन्त्रित रामराज्यमें युद्धकी अपेक्षा शान्तिका ही सर्वातिशायी महत्त्व होता है। साम, दान, भेद तीनो नीतियोसे ही सब काम चलाना श्रेष्ठ है, परंतु सर्वथा तीनो नीतिके विफल होने एव अनिवार्य होनेपर ही चतुर्थ दण्ड-नीतिका प्रयोग करना उचित बतलाया गया है। अहिंसा एव सत्यसे सम्पूर्ण व्यवहार चलाया जाय, विरोधियोंका भी भाव ही बदलनेका प्रयत्न उचित है, परंतु फिर भी तो आखिर समाजवादी रूसको भी तो द्वितीय महायुद्धमे कूदना पडा ही और लालसेनाके करोडो सैनिकोको भरती करना ही पडा। परमाणु बम, हाइड्रोजन बम आदि घातक अस्त्र-शस्त्रोपर अरबो रुपये खर्च करने पड रहे हैं । आखिर जो युद्ध अनुचित समझता है उसकी इस प्रकारकी चेष्टा क्यो-? जैसे समाजवादी कहते हैं कि 'जब विश्वभरमे कम्युनिष्ट राज्य कायम हो जायगा, तब कोई खतरा न रहेगा, तब युद्ध-तैयारी बंद की जा सकेगी। उसके पहले तैयारी न रखनेसे तो पूँजीवादी राष्ट्र रूसको हडप लेगे ।' किंतु यह तो कोई भी कह सकता है कि 'जब विश्वभरमें एक चक्रवर्ती सरकार बन जायगी, तब युद्ध आवश्यक न रहेगा' परंतु प्रश्न तो यह है कि जबतक दोनोके मनोरथ नहीं पूरे होते, तबतक क्या होना चाहिये ? वस्तुतः इस समय क्या पूँजीवादी, क्या समाजवादी अपना-अपना गुट बलवान् बनानेमें लगे हैं । इस समय उपनिवेशवाद समाप्त हो रहा है, परंतु अपने-अपने प्रभाव-क्षेत्रके विस्तारमें सब लगे हैं। अमेरिका अपना प्रभाव-क्षेत्र बढ़ा रहा है, रूस अपना । इसके लिये ही शस्त्रास्त्रकी तैयारी एवं कूटनीतिक दाँव-पेच दोनों ओरसे चले जा रहे हैं, परंतु रामराज्यवादी