मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०६ मार्क्सवाद और रामराज्य अतः हानिके डर एवं लाभके लोभसे काम करनेकी आदत बदल सकती है। आज दिन प्राणी कमाता है। खर्च करनेसे अधिक बटोरकर भी रखता है; क्योकि उसे भय है कि उसे आगे शायद पदार्थ न मिल सके पर यह ठीक नहीं, इसका उत्तर पीछे विकासवादके खण्डनमे विस्तारसे आ चुका है।' अन्तर्राष्ट्रिय क्षेत्रमें पूँजीवाद मार्क्सके अनुसार 'वैज्ञानिक साधनोके विकाससे पैदावारकी शक्तिके बहुत अधिक बढ जानेपर जब भिन्न-भिन्न देशोके पूँजीपति अपनीपैदावारको अपने देशमें नहीं खपा सकते, तब उन्हे दूसरे देशोके बाजारोमें अपना माल पहुँचाना पड़ता है। पूँजीपति अपना माल दूसरे देशोंमें बेचकर मुनाफा उठाना तो पसन्द करते हैं, परंतु अपने देशमें दूसरे देशके पूँजीपतियोंका माल आकर बिकना पसन्द नही करते; क्योकि इससे उनके मुनाफेका क्षेत्र घट जाता है । इसके अतिरिक्त प्रकृतिने उपयोगी पदार्थोंको सभी देशोमे समानरूपसे नहीं बॉट दिया है या प्रकृतिने अलग-अलग देशोको अपना-अपना निर्वाह अकेले कर सकनेके योग्य नहीं बनाया । व्यापार, व्यवसाय और पैदावारके कुछ पदार्थ एक देशमें बहुत अधिक मात्रामें मिल सकते हैं, और कई ऐसे पदार्थ हैं, जो उस देशमे नही मिल सकते । जापानमें लोहा नहीं मिलता, इंग्लैंडमें रूई नहीं पैदा होती, जर्मनीको पेट्रोल बाहरसे लेना पडता है । स्वीडनको अपना लोहा बाहर भेजना जरूरी है। कनाडा अपनी लकड़ीको नहीं खपा सकता; अमेरिका अपनी रूईको बेचनेके लिये जगह ढूंढता रहता है। ये पदार्थ इन देशोंको दूसरोंसे लेन-देने पड़ते हैं । कोई देश अकेले अपना निर्वाह नहीं कर सकता, परतु प्रत्येक देशके पूँजीपति अपने-अपने व्यवसायमें मुनाफा कमानेके लिये दूसरे देशोंके व्यापारिक आक्रमणसे बचाना चाहते हैं और दूसरे देशोंपर आक्रमण करना चाहते हैं। मार्क्सवादी कहते हैं कि "साम्राज्यवादके ऐतिहासिक विकासकी तुलना हम पूँजीवादसे इस प्रकार कर सकते है। पूँजीपति व्यक्तिकी ही तरह किसी उन्नत देशके पूँजीपति अन्तर्राष्ट्रिय क्षेत्रमें कम हैसियतके पूँजीवादी राष्ट्रोको कुचलकर शोषण-क्षेत्रपर अपना एकाधिकार कायम करनेका यत्न करते हैं। जिस प्रकार पूँजीपति एक व्यापारीकी अवस्थासे औद्योगिक साधनोंद्वारा पैदावारके पदार्थोंको बनानेवाला बनकर मुनाफेके जरिये भारी पूँजी इकट्ठी कर चुकनेके बाद स्वयं कुछ भी न कर, रुपयेके रूपमें अपनी पूँजीकी शक्तिको उधार देकर पैदावारका मुख्य भाग स्वयं खींचता रहता है, उसी प्रकार पूँजीपति देश अन्तर्राष्ट्रिय बाजारमें पहले केवल व्यापार, वाणिज्यद्वारा पूँजी इकट्ठी करते हैं । उसके बाद अपनी औद्योगिक पैदावार दूसरे देशोपर लादते हैं और इस अवस्थासे उन्नति कर दूसरे देशोको अपनी पूँजीमें जकड़ना आरम्भ करते हैं । ऐसी अवस्थामे पहुँचकर पूँजीपति देश स्वाधीन देशा और उपनिवेशोकी पैदावारमे कोई भाग नही लेते ।