भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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वे देश पैदावारका मुख्य साधन पूँजी उन देशोंमें लगाकर मुनाफेका भाग खींचते रहते हैं और उन देशोंकी आर्थिक प्रगति और राजनीतिपर अपना नियन्त्रण रखते हैं। जिस प्रकार पैदावारके साधनोंके मालिक, पूँजीपति और परिश्रम करनेवाली साधनहीन श्रेणीके हितोंमें विरोध होता है, पूँजीपति श्रेणी परिश्रम करनेवाली श्रेणीके परिश्रमको मुनाफेके रूपमें निगलती रहती है, उसी प्रकार अन्तराष्ट्रिय पूँजीवाद अर्थात् एक देशके पूँजीपतियोंद्वारा दूसरे देशपर अधिकारका अर्थ हो जाता है--पराधीन देशके परिश्रमका शोषण। "जिस प्रकार परिश्रम करनेवाली श्रेणीके शोषणसे पूँजीपति अपनी शक्तिको बढ़ाकर अपने शोषणका क्षेत्र बढ़ाता है, उसी प्रकार अन्तराष्ट्रिय क्षेत्रमें साम्राज्य- वादी देश एक देशका शोषणकर दूसरे देशोंको पराधीन बनाकर शोषण करनेकी शक्ति प्राप्त करते हैं। मार्क्सवादके अनुसार जिस प्रकार पूँजीवादी व्यवस्थाका अन्त एक देशमे उसे समाप्त कर देनेसे नहीं हो सकता, उसी प्रकार साम्राज्यवादका अन्त भी किसी एक देशके प्रयत्नसे नहीं हो सकता। उसके लिये साधनहीनोंके संगठित अन्तराष्ट्रिय प्रयत्नकी आवश्यकता है। जिस प्रकार एक देशमें पूँजीवाद साधनहीन श्रेणीको पैदाकर अपनी विरोधी शक्ति पैदा कर लेता है, उसी प्रकार अन्तराष्ट्रिय क्षेत्रमें साम्राज्यवादी देश शोषणके क्षेत्रको घेरकर नये शोषित देश पैदाकर अपना विरोध करनेवाली शक्ति पैदा कर देते हैं। जिस प्रकार पूँजीपति अपने देशमें पैदावारके साधनोंपर अधिकार जमाकर मेहनत करनेवाली श्रेणीको जीवन-उपायोंसे हीन कर देता है, उसी प्रकार एक पूँजीवादी देशके साम्राज्यका विस्तार व्यापारके क्षेत्रोंको अपने वशमें कर नये उगते हुए राष्ट्रों और पराधीन राष्ट्रोंके जीवनको असम्भव कर देता है। जिस प्रकार एक देशमें आर्थिक संकट लाकर पूँजीवादी व्यवस्थाकी अयोग्यताको स्पष्ट कर देता है और नयी व्यवस्था लानेकी आवश्यकता उपस्थित कर देता है, उसी तरह अन्तराष्ट्रिय क्षेत्रमें साम्राज्यवादी देश साम्राज्यवादके आगे विस्तारको असम्भव कर देते हैं और नयी व्यवस्था लानेको बाध्य करते हैं। काट्स्कीका कहना है कि 'साम्राज्य-विस्तारका यत्न पूँजीवादका आवश्यक परिणाम नहीं। साम्राज्य-विस्तार नीतिकी जिम्मेदारी पूँजीवादी देशोंके कुछ एक पूँजीपतियोंपर है। इस विषयमे यदि पूँजीवादी देश समझौता करके अपने मालको खपानेके लिये और कच्चा माल प्राप्त करनेके लिये संसारको बाँट ले तो सभी पूँजीवादी राष्ट्रोंकी आवश्यकता पूरी हो सकती है और अन्तराष्ट्रिय युद्धोंका होना जरूरी नहीं रहेगा। परन्तु मार्क्सवादियोके विचारमें काट्स्कीका यह सिद्धान्त न तो इतिहासके अनुभवपर पूरा उतरता है और न पूँजीवादके विकासके मार्गके अनुकूल ही है। काट्स्की इस बातको भूल जाता है जिस प्रकार एक देशमें आर्थिक हितोंकी