मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०८ मार्क्सवाद और रामराज्य क्षाके लिये श्रेणियाँ राजनैतिक शक्तिका व्यवहार करती हैं, उसी प्रकार अन्ता- राष्ट्रिय क्षेत्रमें पूँजीवादी राष्ट्र अपने आर्थिक हितोंकी रक्षाके लिये अपने राष्ट्रोकी सैनिक शक्तिका व्यवहार करते है । जबतक पूँजीवादी राष्ट्रोके सामने अन्ताराष्ट्रिय क्षेत्रमे मुनाफा कमानेका प्रश्न है, उनमें समझौता हो ही नही सकता । प्रत्येक राष्ट्र इस लूटमे सबसे बड़ा भाग लेनेका यत्न करेगा । जबतक बलवान् पूँजीवादी देशोका भय रहेगा, निर्बल पूँजीवादी देश लूटके बाजारमें कम भाग लेना स्वीकार करेंगे । परन्तु अन्ताराष्ट्रिय लूटद्वारा उनकी सैनिक शक्ति बढ़ते ही वह और अधिक बाजारों और उपनिवेशोंकी माँग पेश करेंगे । अभी हालकी अन्ताराष्ट्रिय घटनाएँ इस बातको प्रमाणित कर देती हैं । अपनी पूँजीकी शक्ति और सैनिक शक्ति पहले बढ़ाकर इटलीने अबीसीनियाको हड़प लिया, बादमे अन्ताराष्ट्रिय शान्तिकी रक्षाके लिये उसका और फ्रांसका समझौता टूट गया । दूसरा उदाहरण हमारे सामने जर्मनीका है । अपनी सीमाके देशोंको अपनी पूँजीवादी लूटका क्षेत्र बना चुकनेके बाद भी जब जर्मनीकी पूँजीपति-श्रेणीकी भूख शान्त नही हुई, तब जर्मनीने दूर देशों और उपनिवेशोंकी माँगपर जोर देना आरम्भ किया । मानो निर्बल और पिछड़े हुए देशोंका जन्म जर्मनीके अन्ताराष्ट्रिय पूँजीवादका शिकार बननेके लिये ही हुआ हो । “यदि काट्स्कीके अन्ताराष्ट्रिय पूँजीवादी साम्राज्यवादके सिद्धान्तके अनुसार पूँजीवादी राष्ट्र परस्पर समझौतेद्वारा ससारके निर्बल राष्ट्रोको शोषणके लिये परस्पर बाँट भी ले तो भी वह समझौता ससारमे चिरशान्ति स्थापित नहीं कर सकता; क्योकि शोषित राष्ट्रोकी जनताका भी अपने जीवनके अधिकारोंके लिये प्रयत्न करना आवश्यक और स्वाभाविक है और इस कारण उपनिवेशो तथा पराधीन देशोंमें अन्ताराष्ट्रिय अशान्तिका कारण बना ही रहेगा ।” पर धर्मनियन्त्रित रामराज्यवादीके दृष्टिकोणसे व्यष्टि-समुदाय ही समष्टि है, जैसे वृक्षोका समुदाय ही वन है । प्रत्येक वृक्षके ह्रास, विकास व्यक्तिगत होते हुए भी परिणामतः वनका ह्रास, विकास बन जाता है । व्यक्तिगत विकास-शक्ति नष्ट हो जानेपर वन कभी भी टिक नहीं सकता । इसी तरह प्रत्येकव्यक्ति बुद्धिमानी सावधानीसे व्यक्तिगत एव सामूहिक विकासका प्रयत्न करे तो कुटुम्ब, समाज एव राष्ट्र विकसित हो जाता है । समाजके हितका ध्यान रखते हुए ही व्यक्तिगत विकासका प्रयत्न उचित है। कितने कार्य ऐसे भी होते हैं, जिनमें व्यक्तिगतप्रयत्नसे काम नहीं चलता, वहाँ सामूहिक तोरपर ही कार्य किया जाता है । शुभ, अशुभ कर्मोंका फल व्यक्तिगत रूपसे प्राणियोंको भोगना पड़ता है । छोटी-छोटी इकाइयोमें कार्य करनेमे सुविधा होती है । भोजन-वस्त्रादिका प्रबन्ध भिन्न-भिन्न कुटुम्बोंमें बँटे रहनेसे स्वास्थ्य तथा रुचिकी अनुकूलता अधिक होती है । करोड़ो