मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 72, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ें'एमिल' पुस्तकमें भी ऐसे ही विचार हैं। आधुनिक लोग भी मानते हैं कि 'उसकी अपनी व्यक्तिगत अनुभूतिका ही यह चित्रण है। अपमान और दुःखकी प्रतिक्रिया- स्वरूप ही उसने यह विचार व्यक्त किया है।' सुतरां इसमें तात्त्विक कल्पनाकी अपेक्षा प्रतिक्रियाकी भावना ही अधिक है। उसका विश्वास था कि 'वह नेक था; किंतु समाजकी परिस्थितियोंने उसे अपंग बनाया।' उसने 'सामाजिक अनु- बन्ध' में लिखा है कि किस प्रकार एक ऐसी संस्था स्थापित हो जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अन्य व्यक्तियोंके साथ संघटित होते हुए भी केवल अपनी-अपनी इच्छाका पालन करे, अर्थात् स्वतन्त्रता सुरक्षित रखते हुए कैसे सुव्यवस्था स्थापित की जाय। किंतु गणराज्यीय दृष्टिकोणसे बिना इच्छाओंपर नियन्त्रण किये अर्थात् बिना उन्हें सीमित बनाये कोई भी संघटन हो ही नहीं सकता। समान उद्देश्यकी पूर्तिके लिये एक सूत्रमें सबके मन और इच्छाओंका आबद्ध होना ही वास्तविक संघटन है। कहा जाता है कि 'हूसोकी समस्या स्वतन्त्रता और सुव्यवस्थाका समन्वय थी। इसकी पूर्तिके लिये उसने परम्परागत अनुबन्धका प्रयोग किया। हॉब्सके अनुसार वह व्यक्तियोंद्वारा अपने सभी अधिकारोंका समर्पण आवश्यक समझता था और लॉक