मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 73, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ें६० मार्क्सवाद और रामराज्य कर्तव्यपरायणता, स्वतन्त्रता, आत्मोत्थान, सम्पत्ति, नैतिकता और न्याय-अन्यायका ज्ञान राज्यद्वारा ही सम्भव है।' यह सब व्यक्तिवादका उत्तर था। यहाँ भी रूसोके कथनमें पूर्वापरविरोध है। एक ओर वह समाज और सभ्यताको तथा राज्यसरकार आदि संस्थाओंको गरीबी, भुखमरी, अत्याचार- का सहायक मानता है। उसके पहले व्यक्तिको नैतिक एवं नेक मानता है और दूसरी ओर राज्यके बिना व्यक्तियोको मक्खीतुल्य बतलाता है। रूसो आदर्शराज्यको ही सत्ताधारी मानता था। अर्थात् इस राज्यकी सामान्य इच्छाको सत्ताधारी मानता था। लाकका राज्य संरक्षक मात्र था, सत्ताधारी नहीं। हॉब्सका 'दीर्घकाय' ही सब कुछ था। रूसोने अपने जनवादी राज्यको एक अवयवीकी भाँति माना है। 'सत्ताधारी जनसभा या धारासभा इसका सिर है। नियम एव परम्परा मस्तिष्क; न्यायाधीश, सरकारी कर्मचारी मस्तिष्कके स्नायु, व्यापार-व्यवसाय और कृषि मुख और उदर; आय रक्त और नागरिक शरीरके अङ्गोकी भाँति है। राज्य एवं नागरिकोके सम्बन्ध अवयव एव अवयवीके सम्बन्धके तुल्य हैं। अवयवोकी सुव्यवस्था अवयवीकी सुव्यवस्थापर एव अवयवीकी सुव्यवस्था अवयवोंकी सुव्यवस्थापर निर्भर है। अर्थात् राज्य एवं नागरिकोकी सुव्यवस्था एवं प्रगति अन्योन्याश्रित है।' उसके अनुसार 'सामान्य इच्छा सदा ही नागरिकोकी सामान्य इच्छाका प्रतिनिधित्व करेगी और वह उनके स्थायी हितका प्रतिनिधित्व करेगी।' इसी आधारपर रूसोने यह भी कहा था कि 'नागरिक सदा ही राज्यहितमें व्यक्तिगत हित देखेगा, सदा राज्यकी सामान्य इच्छाके अनुसार ही सोचेगा। ऐसा न करनेवाला नागरिक भ्रान्त है। ऐसे भ्रान्तको राज्यकी इच्छाका अनुसरण करनेके लिये बाध्य किया जायगा, अर्थात् उसे स्वतन्त्र होनेके लिये राज्यद्वारा बाध्य किया जाना चाहिये।' वस्तुतः यह सामान्य इच्छा एक प्रत्यक्ष जनवादी संघ हॉब्सके दीर्घकायके ही तुल्य सर्वसर्वा है और वह निरपेक्ष है। मनुष्यकी सद्भावनापर रूसोका अटूट विश्वास था। उसके अनुसार 'राजनीति और प्रचारकोद्वारा विशुद्ध मनुष्य प्रवञ्चनामें डाला जाता है। राजनीतिक दल, समाचारपत्र आदि यन्त्र ऐसी प्रवञ्चनाके स्रोत है। ये यन्त्र नागरिकोंको कृत्रिमरूपसे सख्याओमें विभक्त कर देते हैं। दलोकी इच्छासे उनके सदस्य प्रभावित भी होते हैं। इन दलों या यन्त्रोद्वारा कई सामान्य इच्छाएँ बन जाती हैं। अतः ऐसे राजनीतिक दल या सङ्घ आदर्श सुव्यवस्थामें अनावश्यक ही नहीं, किंतु बाधक भी होते हैं। इनके न रहनेपर राज्य और नागरिकोंमें सीधा सम्बन्ध रहता है। नागरिक सदा ही दल या सस्थाओकी अपेक्षा राज्यके हितमें ही अपना हित समझेगे। वे सामान्य इच्छाके अनुसार जीवन-यापन करना ठीक समझते हैं।' इसीलिये रूसो 'अद्वैतवादी दार्शनिक' समझा जाता है। 'संघों, दलोंको समाप्त करनेके लिये उनकी संख्या बहुत बढ़ा देनी चाहिये। इससे