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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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रूसोके विचार ६१ वे स्वयं अस्तित्वहीन हो जाते हैं।' रूसो प्राचीन नैसर्गिक स्वतन्त्रताकी प्राप्ति सम्भव नहीं समझता था। परंतु एक उच्च नैतिक नागरिक स्वतन्त्रताकी प्राप्ति सम्भव मानता था। उसके मतानुसार 'नागरिकोंकी सभा ही नियमनिर्णयकी अधिकारिणी है, प्रतिनिधि-सभा नहीं। नियमोंको कार्यान्वित करनेके लिये कार्यपालिका होती है। कार्य- पालिका नागरिकोंकी सभाके प्रति पूर्ण उत्तरदायी होती है। यह कार्यपालिका ही सरकार होती है।' रूसोके मतानुसार 'ऐसा जनवाद अपने सदस्योंसे स्थायी सतर्कताकी आशा रखता है। यद्यपि ऐसे जनवादको सदा ही खतरा रहता था। उसका आदर्श वाक्य था 'मैं खतरनाक स्वतन्त्रताको शान्ति पूर्ण दासत्वसे अच्छा समझता हूँ।' ऐसे नागरिक ही इस व्यवस्थाको स्थायी बना सकते हैं।" रूसोका यह ऐतिहासिक वाक्य है कि 'जनवाणी ही देववाणी है।' उसने सामान्य इच्छाको निरपेक्ष, अदेय, अविभाज्य, स्थायी एवं सत्य माना है। उसने हॉब्सकी 'निरपेक्षता' और लॉक- की 'जनस्वीकृति' का मिश्रण किया है। उसने हॉब्सकी निरपेक्षताको जनवादी रूप और लॉककी जनस्वीकृतिको सक्रिय रूप दिया। रूसोकी पुस्तकोमें क्रान्तिकी ज्वाला धधक उठी, परंतु वह स्वयं क्रान्तिकारी नहीं था। उसने १७५२ के अपने एक भाषणमें कहा कि 'क्रान्तिको उतना ही भयानक मानना चाहिये, जितना कि उन बुराइयोंको—जिन्हें क्रान्ति दूर करना चाहती है।' उसने जेनेवाके नागरिकोंको लिखा था कि 'आप स्वतन्त्रता अवश्य प्राप्त कीजिये, परंतु मानव- हत्याके विरुद्ध दासताको पसंद कीजिये।' नियम बनानेका कार्य किसी राष्ट्रके सम्पूर्ण नागरिकोंद्वारा हो सकना सम्भव नहीं होता। जनताद्वारा निर्वाचित प्रति- निधियोंद्वारा ही वह सम्भव होता है। अतः प्रतिनिधिसभाका विरोध भी रूसोका अयौक्तिक है। 'सभ्य समाजने व्यक्तिको दुखी, अनैतिक, व्यभिचारी बनाया' यह भी रूसोकी धारणा भ्रान्तिपूर्ण है। विशिष्ट विचारशील लोग ही मार्गदर्शक हो सकते हैं। राब्सपीयरने रूसोको 'राज्यक्रान्तिका देवता' घोषित किया था। रूसो व्यक्तिवादका समर्थन करते हुए पूर्ण अराजकतावादी स्वतन्त्रताका समर्थक बन जाता है और सभ्य समाजका कट्टर विरोधी प्रतीत होता है। वह स्वतन्त्रता, नैतिकता एवं समाजका विरोध मानता था। इसी आधारपर फ्रांसीसियोंने तत्कालीन समाजका विरोध किया, व्यक्तिगत सुरक्षाके लिये संघर्ष किया और क्रान्तिके पश्चात् 'राष्ट्रिय सभा' की घोषणा हुई। यह विचारधारा भविष्यके व्यक्तिवादियोंकी पृष्ठभूमि बनी, क्योंकि व्यक्तिवादी भी स्वतन्त्रता तथा समाजका परस्पर विरोध मानते थे। वार्करने रूसोके लेखको 'व्यक्तिवादका प्राण' कहा, था, परंतु अन्यत्र रूसो अधि- नायकवादका भी समर्थक प्रतीत होता है, जैसा पहले दिखाया जा चुका है कि