भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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कुछ भी हिस्सा न मिलेगा । परंतु उत्पादनमें इन वस्तुओका महत्त्वपूर्ण स्थान है—ये सब बाते विस्तारसे पहले सिद्ध की जा चुकी हैं । परिश्रम करनेवालेका वही फल है जो मजदूर और मालिकके समझौते या पञ्चायत अथवा न्यायालयद्वारा वेतन निर्धारित होता है । मुनाफा श्रमका फल नहीं; किंतु कच्चे माल, मशीन तथा पूँजीका फल है । श्रमका फल श्रमिकको वेतनके रूपमें मिल चुका । यदि सम्पूर्ण मुनाफा मजदूरको दे दिया जाय तो पैदावार करनेके साधन; नये यन्त्र, कल, कारखाने आदि विकसित न हो सकेगे न बढ ही सकेगे । मजदूरको जो मिलेगा, वह खर्च कर डालेगा । मजदूर-सरकार भी यदि लागत खर्च निकालकर सब लाभ मजदूरोको बाँट दे तो वह भी कल, कारखानोका विकास न कर सकेगी । अतः मजदूर सरकार भी विकासके लिये लाभांश बचाती है और वह विकास भी समाजके हितके लिये ही होता है । यही बात दूसरे पक्षमें भी कही जा सकती है । अतएव पूँजीवादी भी तो लाभका उपयोग कल, कारखानोंके विस्तारमे—उद्योगोंके विस्तारमें लगाता है । उससे समाजका जीवनस्तर विकसित होता है । कोई भी पूँजीपति रुपयोंको निश्चल जमा रखनेमें लाभ नहीं समझता । पूँजीपतिका अपना निजी खर्च मजदूर-देशके मन्त्रियोसे कम ही होता है । रूसी नेता बुल्गानिन और क्रुश्चेवके स्वागतमें करोड़ों रुपये खर्च हो गये । वे भी मजदूर ही हैं । कहा जा सकता है कि यह सम्मान व्यक्तिका नहीं; किंतु एक राष्ट्रका था । इसपर दूसरे लोग भी कह सकते हैं कि एक राजाका भी स्वागत उसके व्यक्तिगत न होकर राज्यका ही होता है । किसी भी विद्वान् या धनवान्पर जो भी खर्च होता है, वह राष्ट्र एव उसकी विद्या तथा सम्पत्तिपर ही खर्च होता है । जिन पुराने बादशाहोका हजारों रुपये रोजका खर्च था, वह भी क्या था ? उनके हजारों नौकरोंकी जीविका इसीसे चलती थी । उत्तमोत्तम वस्तुके खरीदनेमें जो रुपये खर्च होते थे, वह कारीगरो, कलाकारो और निर्माताओके पास जाता था । अस्तु, रामराज्य-प्रणालीसे उत्पादनवृद्धिके अनुसार कामके घटोंमें कमी, मजदूरोकी संख्या और वेतनवृद्धिका क्रम लगा रहता है । अतः समाज या मजदूरोंके क्रय-शक्तिके घटनेका कोई भी प्रश्न नही खड़ा होता । बेकारी एवं भूखे, नंगे रहनेका किसीको अवसर ही नहीं होगा । व्यक्ति और समाज सबका कर्तव्य है कि समाजमें कोई भी भूखा, नगा, बेरोजगार, बेकार न रहने पाये । पूँजीपति, उत्पादन-साधन, उत्पादक, श्रमिक तथा अन्य बुद्धिजीवी लोगोके हितके स्वत्वरक्षणका प्रयत्न होगा । 'मार्क्सवादियोके अनुसार प्राकृतिक अवस्थाओके कारण सभी देशोमे औद्योगिक विकास समानरूपमे नही हो पाता । औद्योगिकरूपसे जिन देशोका विकास कम हुआ है,