भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ४११ उनमें खेतीद्वारा कच्चे मालकी पैदावार अधिक होती है और वह देश अपने कच्चे मालकी पैदावारको खपा सकनेमें असमर्थ रहते हैं। इन देशोंमें कच्चा माल सस्ता मिल सकता है और औद्योगिक मालको बेचकर मुनाफा कमानेकी गुंजाइश रहती है। इसलिये औद्योगिकरूपसे उन्नत देश कम उन्नत देशोंपर प्रभुत्व जमाकर आर्थिक लाभ उठानेका यत्न करते हैं। कम उन्नत देश पूँजीवादी देशद्वारा अपने शोषण- को रोक न सके, या दूसरे उन्नत पूँजीवादी देश उन देशोंमे आकर उनका बाजार खराब न कर सके, वहाँ उनका पूरा एकाधिकार और ठेका कायम रहे, इसलिये औद्योगिकरूपसे उन्नत पूँजीवादी देश कम उन्नत देशोको अपने राजनैतिक अधिकारमे रखनेका यत्न करते हैं। कम उन्नत देश या तो उन्नत पूँजीपति देशोके अधीन हो जाते हैं या उन्हे उपनिवेश बना लिया जाता है या उन्हे सरक्षणमें ले लिया जाता है। इस प्रकार यूरोपके कुछ देशोने औद्योगिक विकास और पूँजीवाद- की उन्नतिके बाद सन् १८७६ से लेकर १९१४ के महायुद्धसे पूर्व कम उन्नत देशो अफ्रीका, एशिया आदिमें यूरोपके क्षेत्रफलसे दुगुनी भूमिपर अपना अधि- कार कर लिया । इसमें सबसे अधिक भाग था इंग्लैंड और फ्रासका। इंग्लैंड इससे पूर्व भी भारत, ब्रह्मा आदि देशोको अधीन कर चुका था और कनाडा, आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीकामें अपने उपनिवेश बसा चुका था। जर्मनी और इटलीमें पूँजीवादका विकास बादमे होनेके कारण उनके होश सँभालनेसे पहले ही इंग्लैंड और फ्रांस पृथ्वीका बड़ा भाग सँभाल चुके थे। भूमिकी एक सीमा है, उसे पूँजीवाद देशोंके शोषणके लिये आवश्यकतानुसार बढाया नहीं जा सकता; इसलिये पूँजीवादी देशोंमें झगडा होना आवश्यक हो जाता है।' पूँजीवादी साम्राज्यवाद मार्क्सवादके अनुसार 'किसी देशका पूँजीवाद जब मुनाफेके लिये अपने देशसे बाहर कदम फैलाता है, तब वह साम्राज्यवादका रूप धारण कर लेता है। प्राचीन समयका साम्राज्यवाद सैनिक आक्रमणके रूपमें आगे बढ़ता था और पराधीन देशोका शोषण भूमि-करके रूपमें बरतता था। पूँजीवादका साम्राज्य-विस्तार आरम्भ होता है व्यापारसे। फिर अपने व्यापारको दूसरे देशोंके मुकाबलेमें सुरक्षित रखनेके लिये और पिछड़े हुए देशोंके कच्चे मालपर एकाधिकार रखनेके लिये साम्राज्यवादी देशोंमे परस्पर झगड़ा और युद्ध होता है।' मार्क्सवादके अनुसार पूँजीवादके ऐतिहासिक विकासका परिणाम है साम्राज्यवाद। जिस प्रकार पूँजीवाद, व्यक्ति-स्वतन्त्रतासे आरम्भ होकर पूँजी- पतियोंके एकाधिकारमें परिवर्तित हो जाता है, उसी प्रकार साम्राज्यवाद भी अन्तर्- राष्ट्रिय स्वतन्त्र व्यापारसे आरम्भ होकर बलवान् पूँजीपति राष्ट्रके एकाधिकारमें