भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 727, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 727

·४१४· मार्क्सवाद और रामराज्य अशान्तिकी जड़-आर्थिक विषमता मार्क्सवादके दृष्टिकोणसे 'वर्तमान संसारमे व्यक्तिके जीवनसे लेकर अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितितक सभी संकटोंका कारण आर्थिक विषमता ही है। समाजमे पैदावार समाजके हितके लिये नहीं की जाती, बल्कि कुछ व्यक्तियोके मुनाफेके लिये ही की जाती है। इसीलिये ऐसी विषमता पैदा हो जाती है। इस विषमताको कायम रखने- के लिये पूँजीवादी समाजमे सरकारकी व्यवस्था और अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्रमें साम्राज्यकी व्यवस्था करनी पडती है। मार्क्सवाद समाजमे एक नयी व्यवस्था लानेके लिये यत्न करना चाहता है, जिसमे यह सब विषमताएँ और बन्धन न रहे, जो व्यक्ति और समाजके विकासको असम्भव बना रहे है। मार्क्सवादके सिद्धान्त इसी प्रकारकी नयी व्यवस्था कायम करनेकी शक्ति रखते है या नही, इस बातको स्पष्ट करनेके लिये उन्हे उनके वास्तविक रूपमें रख देनेका यत्न किया गया है। समाजमे शान्ति और व्यवस्था कायम करनेके लिये समय-समयपर अनेक सिद्धान्तोंका जन्म हुआ है। इन सिद्धान्तोका समुच्चय ही समाजशास्त्र है। मार्क्सवाद आदि कालसे संकलित होते हुए समाज-शास्त्रका सबसे नवीन अध्याय है।' परंतु उनका यह कथन पिष्टपेषणमात्र है। यदि कोई व्यक्ति, वर्ग अथवा राज्य स्वतन्त्रता चाहता है, तानाशाही कम्युनिष्ट शासनयन्त्रका नगण्य कल-पुर्जा नहीं बनना चाहता, तो वह स्वयं ही परिश्रम कर, सम्पत्ति-विपत्तिका खतरा उठाकर, प्रमाद, आलस्यपरित्यागपूर्वक तत्परतासे विद्वान्, बलवान्, धनवान् बननेके प्रयत्नसे अच्छी स्थितिमें पहुँच सकता है। इसमे कोई आश्चर्य नहीं। जैसे किसी दासको स्वतन्त्ररूपसे अपने परिवार चलानेके लिये चिन्ता नहीं होती थी, मालिक अपनी परिस्थितियोंके अनुसार उनकी व्यवस्था करता था। उसी तरह कम्युनिष्ट-शासनमे दासके तुल्य जनसामान्यको निश्चित रहना सम्भव हो सकता है, खान-पान-वस्त्रकी निश्चिन्तता रह सकती है, परंतु स्वाधीनतापूर्वक अपनी जीवन व्यवस्थाके संचालनकी दृष्टिसे यह स्थिति नगण्य है। यों तो अच्छे मालिकके कुत्तेकी भी खान-पान, आराम शिक्षण आदिकी अच्छी व्यवस्था होती है, किंतु क्या वह आदर्श स्थिति कही जा सकती है ? स्वाधीनतापूर्वक जीवन- निर्वाहके लिये व्यक्तिगत भूमि-सम्पत्ति, रोजगारोंकी भी स्वतन्त्रता अपेक्षित होगी। उसमे एकको दूसरेकी सहायता अपेक्षित होगी। इसलिये एकको दूसरेसे ऋणके रूपमें सहायता लेनी पडती है। किसीसे भूमि भी कर देकर लेनी पड़ती है। अपनी कमाईसे ही उस अंशको चुकाना पडता है। इसे कोई भी सभ्य समाज शोषण नहीं कह सकता। हाँ, यदि अनुचितरूपमे कर या सूद देना पड़े तो अवश्य शोषण कहा जा सकता है, परंतु जहाँ सरकार या न्यायालय या पञ्च अथवा आर्ष

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन) · पृष्ठ 727, कुल 866 में से · BharatKosha