भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 728

मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ४१५ शास्त्रोंद्वारा सूद या करकी दर निश्चित होती है, वहाँ शोषणकी बात नहीं कही जा सकती । ठीक इसी तरह अधिक विकसित देश कम विकसित देशोंको मुद्रा अथवा कल-कारखानोंकी सहायता दें और उनसे उनके बदले कच्चा माल या अन्य कुछ लें तो यह भी शोषण नहीं कहा जा सकता। किंतु आपसी समझौताके आधारपर ही यह सब होता है । विकसित देशोंकी सहायतासे ही अविकसित देशोंका विकास सम्भव है। कम्युनिष्ट राज्य भी आपसमे सहायता करते हैं और बदलेमे कोई दूसरी चीज प्राप्त करते हे । यदि इसे ही शोषण कहा जाय तो कम्युनिष्ट राज्य भी शोषक हैं। यदि छोटे-से मजदूरसे राज्यका मिनिस्टर या फील्डमार्शल बन जाना अपराध नहीं है तो छोटे व्यापारीसे बडा धनवान् या पूँजीपति बन जाना भी अपराध नहीं है। कोई राज्य-सरकार कभी धनहीन होती है, दूसरोंसे कर्ज लेती है; पर वही सदुद्योगसे बहुधन-सम्पन्न हो जाती है और दूसरोंकी भी सहायता करनेवाली हो जाती है। पर यह कोई अपराध नहीं गिना जाता। हाँ, यदि दूसरोंको नुकसान पहुँचाकर, दूसरोंके साथ अन्याय करके ऐसा किया जाता है तो अवश्य अपराध है और ऐसा अपराधी चाहे व्यक्ति, चाहे वर्ग, चाहे सरकार हो, वह दण्डनीय है। रहा यह कि पूँजीपति बिना कुछ किये ही यह लाभ उठाता है तो यह भी कथन व्यर्थ है। फड़वा चलाना ही काम नहीं है, महाव्यापारका संचालक भी काम करता है। सैनिक बन्दूक चलाता है, युद्ध-मन्त्री केवल नीति-निर्धारण करता है। व्यापार-सञ्चालनसे होनेवाला महान् लाभ भी राष्ट्रकी ही सम्पत्ति होगी। आवश्यकता पड़नेपर राष्ट्रके हितार्थ सहायताके रूपमें उसका उपयोग हो सकता है। रामराज्यप्रणालीका मुख्य आदर्श ही यही है कि न कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्तिका शोषक हो, न कोई वर्ग दूसरे वर्गका शोषक हो और न कोई राष्ट्र दूसरे राष्ट्रका शोषक हो, किंतु सब एक दूसरेके पोषक होने चाहिये। जहाँतक दूसरेको सहायता पहुँचानेका प्रश्न है, वह ठीक है। नाममात्रका उससे अपना भी लाभ निकालना हो तो भी कोई हर्ज नहीं, किंतु सहायता पहुँचानेके नामपर दूसरे वर्गों या राष्ट्रोंका शोषण करना सर्वथा अपराध है। उत्तम सिद्धान्त तो यह है कि परार्थ ही अपना स्वार्थ माना जाय । मध्यम बात यह है कि स्वार्थके अविरोधेन परार्थ किया जाय। दूसरेका नुकसान कर अपना स्वार्थ-साधन तो विशुद्ध आसुरी प्रकृति है और इससे संघर्ष और विनाश ध्रुव होता है। शोषक व्यक्ति, शोषक वर्ग या शोषकराज्यविरोधी शोषितसमूह अवश्य होगा। इसी तरह शोषित राज्यों तथा वर्गोंमें भी प्रबल निर्बलके शोषक होते ही हैं। मार्क्सवादी भी मानेगे कि पराधीन राष्ट्रोंमें भी सामन्त तथा पूँजीपति किसान-मजदूरोंके शोषक होते हैं। बड़े मजदूर तथा बड़े किसान छोटे मजदूर तथा