मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१६ मार्क्सवाद और रामराज्य
किसानोके शोषक होते हैं । इसीको मात्स्यन्याय कहते हैं । इसीको अन्त करनेके लिये धर्मनियन्त्रित शासन धर्मराज्य या रामराज्य अपेक्षित होता है । मार्क्सवादी वर्ग- संघर्ष, वर्गविध्वंसद्वारा समस्याका समाधान चाहते हैं। रामराज्यवादी धर्म, अहिंसा, सत्य, सामञ्जस्य, समन्वयद्वारा तथा अचिकित्स्य अन्यायीको दण्डद्वारा वर्ग- विद्वेष रोककर वर्गसद्भाव एव सामञ्जस्यद्वारा समस्याका समाधान चाहता है । वर्गके भीतर पुनः नये वर्ग सम्भव होते हैं । एक वर्गमें भी शतशः संघर्ष देखा जाता है । अतः सद्भाव बिना कभी भी शोषण तथा अशान्तिका अन्त नही हो सकता । अतः रामराज्यवादीकी धर्म नियन्त्रण अङ्गीकार बिना दूसरी गति नहीं है । जैसे शोषक-श्रेणीमें भी एक दूसरेके शोषक होते हैं, वैसे शोषित-श्रेणीके लोग भी एक दूसरेके शोषक होते हैं । साँपके मुँहमें पड़ा हुआ मेढक शोषित-उत्पीड़ित ही है, तो भी वह मच्छरोके खानेके लिये जीभ लपलपाता ही है । इस तरह शोषित ही दूसरोंका शोषक होता है । मालिकका खैरख्वाह बड़ा कर्मचारी एक तरहका मजदूर ही है । वही दूसरे मजदूरोको वेतन कम देकर कामके घंटोको बढ़ाकर शोषण करता है । मार्क्सवादी मजदूरोके इस कार्यको अज्ञानमूलक कहकर समाधान करते हैं । परन्तु कोई भी शोषण वस्तुतः अज्ञानमूलक ही होता है । अपने स्वार्थके सामने जैसे बड़ा मजदूर समाजका हित भूल जाता है, वैसे ही अपने स्वार्थके सामने पूँजीपति भी समाजके हितको भूल जाता है । इसी स्वार्थमूलक अविवेकको मिटानेके लिये ईमानदारी तथा विवेककी आवश्यकता होती है । समाजवादी व्यवस्थामें भूमि, सम्पत्ति, उत्पादनके साधन सबपरसे स्वतन्त्रता समाप्त हो जाती है। सरकारी वस्तु या सहकारिताके आधारपर होनेवाले उत्पादनोमें कोई व्यक्ति इच्छानुसार उपयोग नहीं कर सकता । किसी अतिथिको भोजन कराना हो या किसी समय जाड़ेकी रात काटनेके लिये धानकी भूसीकी ही आवश्यकता हो तो भी अपनी वस्तु-जैसा उसका यथेष्ट विनियोग नहीं किया जा सकता । गेहूँ- जौके खेतसे दम बाली या बजड़े, जुआर या मक्काके कुछ बाल भी शामिलात खेतोंसे स्वतन्त्रतापूर्वक नहीं लिये जा सकते । शहरकी अपेक्षा गाँवोंमें यही विशेषता है । वहाँ हर वस्तुके लिये दामकी अपेक्षा नहीं रहती । किसान स्वतन्त्रता- पूर्वक वस्तु तैयार करता है । स्वतन्त्रतापूर्वक विनियोग करता है । सर्षप, वास्तुक, पालक आदिके शाक इच्छानुसार पैदा किये जा सकते हैं । थोड़े ही खेत तथा थोडी ही सम्पत्तिमें अपने कुटुम्बके उपयोगकी सब वस्तु तैयार कर ली जाती है— तरुणं सर्षपशाकं नवोदनं पिच्छलानि च दधीनि । अल्पव्ययेन सुन्दरि ग्राम्यजनो मिष्टमश्नाति ॥ उसीमेंसे अन्नदान, वस्त्रदान, सुवर्ण-रजतदान, यज्ञ, तीर्थयात्रा सब कुछ कर लेता है । समाजीकरणमें यह सब कुछ नहीं बन सकता । कुत्तोंको रोटी मिल