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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 730, कुल 866 में से

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मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ४१७ जायगी किंतु भूँकनेकी स्वतन्त्रता न रह जायगी । बकरीको चना मिल जायगा, किंतु जुगाली करनेकी स्वाधीनता न रहेगी । ऐसे ही किसी तरह कुछ रोटी-कपड़ा मिल जायगा, पर धार्मिक आचार-विचारोंकी स्वतन्त्रता नहीं रह जायगी । रामराज्य-प्रणालीमें सब प्रकारकी स्वाधीनता एवं सामञ्जस्य होनेसे संघर्ष बचेगा । धर्मनियन्त्रण तथा विवेकसे अभ्युदय तथा आर्थिक संतुलन एवं समन्वय हो सकता है। व्यक्तिगत-सम्पत्तिका सिद्धान्त रहनेपर ही उत्तराधिकारकी बात चलती है । यह भी पशुओंकी अपेक्षा मनुष्योंकी ही विशेषता है कि पिता-पितामह आदिकी सम्पत्ति पुत्र-पौत्रोंकी बपौती सम्पत्ति होती है, एतदर्थ धर्मका सम्बन्ध भी अनिवार्य होता है । पिता आदिको पिण्ड-श्राद्धादि प्रदान करनेके अधिकारी ही दायाधिकारी होते हैं । इसके लिये प्रत्यक्ष-अनुमानसे भिन्न एक वचन प्रमाण भी मानना पड़ता है । पिताकी सम्पत्तिपर विवाद उठनेपर सिद्ध करना पड़ता है कि अमुक हमारे पिता हैं । इसे सिद्ध करनेके लिये प्रत्यक्षानुमान असमर्थ हैं । इसमें तो माता- पिताका वचन ही प्रमाण मानना पड़ता है । उसके बिना पिता आदिकी सिद्धि नहीं हो सकती । वचन प्रमाण माननेपर ही माता-भगिनी, पुत्री-पत्नी आदिमें भी भेद सिद्ध होता है । तदनुसार ही संसारभरमें सर्वत्र भेद-व्यवहार चलता है । पत्नी, पुत्री, भगिनी सभी स्त्री हैं । फिर भी पत्नी, भगिनी आदिके साथ व्यवहार- भेद करना पड़ता है । पशुओंमें प्रत्यक्षानुमान तो मान्य है, किंतु आगम—वचन प्रमाण मान्य नहीं है, अतः उनके यहाँ न व्यक्तिगत सम्पत्ति है न उत्तराधिकार है और न पत्नी, भगिनी, पुत्री, माता आदिका भेद-व्यवहार ही चलता है । वह इनमेंसे किसीको भी पत्नी बनाकर संतान पैदा कर सकता है, पर यह सब मानवताके विपरीत है । जिस दिन मनुष्य भगिनी-पुत्रीसे संतान उत्पन्न करने लगेगा, उस दिन मनुष्यता-पशुतामें कोई भेद न रहेगा । कम्युनिष्ट भी ऐसा करनेका साहस नहीं कर सकता है । इस तरह रामराज्य-प्रणालीमें आगम-प्रमाण तथा धर्मका भी आदर कर पितृपितामहादिकी सम्पत्तिका उत्तराधिकार तथा धार्मिक विवाहादिकी मान्यता होती है । स्वार्थ-परार्थका समन्वय करके व्यष्टि-समष्टिके अभ्युदयका प्रयत्न किया जाता है । यह सही है कि लोभाभिभूत व्यक्ति या राष्ट्र आत्मनाश नहीं देखते । हरित तृणके लोभमें बकरी कूप-पतनकी चिन्ता नहीं करती है, मधुलोभमें पड़कर प्राणी आत्मप्रपात नहीं देखता, पर कोई भी समझदार सर्वनाश देखकर समझौता करता ही है । अमेरिका और रूस दोनों ही एक-दूसरेका नाश चाहते हैं । दोनों ही परमाणु, हाइड्रोजनबमकी धमकी देते हैं । तथापि एक दूसरेके भयसे नियन्त्रित मा० रा० २७—

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