मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै; तभी तो आज सह-अस्तित्वका राग अलापा जा रहा है । यदि रूसी साम्राज्य- वादियोंके साथ सह-अस्तित्व सम्भव समझते हैं, तब तो साम्राज्यवादी भी परस्पर तथा आत्महितकी कामनासे अपने लोभकी मात्राको संकुचित कर सकते हैं । इस समय संयुक्तराष्ट्रसंघद्वारा भी बहुत कुछ नियन्त्रण और समन्वय हो सकता है । मार्क्सवादियोंके मतानुसार भी जब अन्ताराष्ट्रिय मजदूर-राज्य स्थापित हो जायगा, तभी सब संघर्षोंका अन्त हो सकता है । धर्मनियन्त्रित रामराज्यवादीके सार्वभौम शासनमें तो स्पष्ट ही उसके द्वारा सब अन्यायोंका निराकरण हो जायगा । इसे ऐतिहासिक अनुभवोंके विपरीत नहीं कहा जा सकता । भले ही आधुनिक मनगढंत मिथ्या इतिहासके अनुसार रामराज्य ऐतिहासिक तथ्य न हो, परन्तु आर्ष प्राचीन इतिहासके अनुसार अखण्ड भूमण्डलव्यापी सार्वभौम रामराज्य परम ऐतिहासिक तथ्य है । हाँ, मार्क्सका सर्वहारा राज्य अभीतक निराकार स्वप्न ही है । इतिहास साक्षी है कि धर्महीन, जडवादी राज्य कभी पनप नहीं सका है। शान्ति और समन्वय तो धर्महीन राज्यमें असम्भव है । काट्स्कीका अन्ताराष्ट्रिय पूँजीवादी साम्राज्यवाद तथा मार्क्सका विश्वव्यापी सर्वहारा राज्य मुकाबिलेकी ही चीज है । किंतु रामराज्यवादीका धर्मनियन्त्रित सार्वभौम राज्य सहस्रशः अनुभूत प्रयोग है । मान्धाता, दिलीप, अज, रामचन्द्र, नहुष, पुरूरवा, अलर्क आदिका अखण्ड भूमण्डलवर्ती धर्मराज्य पूर्णतया शान्तिके स्थापक रह चुके हैं । लाखो वर्षोंके अनुभवोंके सामने सौ-दो सौ-वर्षके मार्क्सवादी अनुभव कुछ भी मूल्य नहीं रखते । मार्क्सवादी सर्वहारा राज्य या पूँजीवादियोका अन्ताराष्ट्रिय साम्राज्य- वाद किसी पथको अपनाये, उसमें धर्म-नियन्त्रणके बिना लूट-खसोटका अन्त नहीं हो सकता ।
मार्क्सवादमें यह भी कहा जा सकता है कि वहाँ किसीके पास कुछ चीज़ नहीं रह जायगी, फिर कौन किसकी क्या चीज लूटेगा ? इसमें तो सभी फाँकेमस्त ही होगे, परंतु रामराज्य-प्रणालीमें तो सार्वभौमका नाममात्रका ही नियन्त्रण होगा, वस्तुतः सर्वोपरि धर्मका ही नियन्त्रण मुख्यरूपसे रहेगा । मार्गमे पड़े हुए दो लाख- कें नोट पाकर जिसका है उसे लौटा देनेकी सलाह मार्क्सवादी नही दे सकता । यह तो रामराज्यवादी ही कह सकता है । परान्न या परद्रव्य मार्गमें हो चाहे गृहमें ही पड़ा हो, विधिपूर्वक बिना पाये नही लेना चाहिये । यहाँ तो बाजारोंमें माल भेजनेका उद्देश्य केवल मुनाफा नहीं, किंतु वितरण ही है । लाभ भी अवश्य हो सकता है, किंतु वह आनुषङ्गिक है, मुख्य नहीं । अतएव किसीके द्वारा किसी राष्ट्रके शोषण- की भी बात नहीं आयेगी, क्योकि समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृत्ताके दृष्टिकोणसे जैसे एक व्यक्ति दूसरेका पोषक होगा, वैसे ही एक राष्ट्र, एक वर्ग भी दूसरे राष्ट्र, दूसरे वर्गोंका शोषक न होकर पोषक ही होगा ।